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Osho · Hindi discourse

Preetam Chhabi Nainan Basee 11/16

Talk 11 of 16 in Preetam Chhabi Nainan Basee, a series of Osho's Hindi discourses (pravachan). Listen free, and read the full transcript below.

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Topics in this talk

Transcript

पहला प्रश्न:

भगवान, संबोधि क्या है? और संबोधि दिवस पर आपका संदेश क्या है?

नरेंद्र बोधिसत्व,

महान सिकंदर भारत आया। उसने एक फकीर के हाथ में एक चमकती हुई चीज देखी। पूछा, क्या है? वह फकीर बोला, बताऊंगा नहीं। बता नहीं सकूंगा। यह राज बताने का नहीं है।

लेकिन सिकंदर जिद्द पर अड़ गया। उसने कहा, हार मैंने माननी जीवन में कभी सीखी नहीं है। जान कर रहूंगा।

तो फकीर ने कहा, एक बात बता सकता हूं कि तुम्हारी सारी धन-दौलत इस छोटी सी चीज के सामने कम वजन की है।

सिकंदर ने तत्क्षण एक बहुत विशाल तराजू बुलाया और लूट का जो भी उसके पास सामान था, हीरे-जवाहरात थे, सोना-चांदी था, सब उस तराजू के एक पलवे पर चढ़ा दिया और उस फकीर ने उस चमकदार छोटी सी चीज को दूसरे पलवे पर रख दिया। उसके रखते ही फकीर का पलवा नीचे बैठ गया और सिकंदर का पलवा ऊपर उठ गया--ऐसे कि जैसे खाली हो! सिकंदर किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया। झुका फकीर के चरणों में और कहा, कुछ भी हो, नतमस्तक हूं। लेकिन राज मुझे कहो।

फकीर ने कहा, राज कहना बहुत मुश्किल है। कहा नहीं जा सकता, इसलिए नहीं कह रहा हूं। लेकिन तुम झुके हो, इसलिए एक बात और बताए देता हूं।

एक चुटकी धूल उठाई रास्ते से और उस चमकदार चीज पर डाल दी। और न मालूम क्या हुआ कि फकीर का पलवा एकदम हलका हो गया और ऊपर की तरफ उठने लगा और सिकंदर का पलवा भारी हो आया और नीचे बैठ गया। स्वभावतः सिकंदर तो और भी चकित हुआ। उसने कहा, यह मामला क्या है? तुम पहेलियों को और पहेलियां बना रहे हो, और उलझा रहे हो। सीधी-सादी बात है। कहना हो कह दो, न कहना हो न कहो।

उस फकीर ने कहा, अब कह सकता हूं। अब तुम जिज्ञासा से पूछ रहे हो। अब जोर-जबरदस्ती नहीं है। यह कोई खास चीज नहीं है; मनुष्य की आंख है। धूल पड़ जाए, दो कौड़ी की। धूल हट जाए तो इससे बहुमूल्य और कुछ भी नहीं--सारी पृथ्वी का राज्य भी नहीं, सारी धन-दौलत फीकी है।

संबोधि का अर्थ होता है, नरेंद्र, तुम्हारे भीतर की आंख। और कुछ ज्यादा कठिनाई की बात नहीं है; थोड़ी सी धूल पड़ी है--सपनों की धूल। धूल भी सच नहीं। विचारों की धूल। कल्पनाओं की धूल। कामनाओं की धूल। धूल भी कुछ वास्तविक नहीं, धुआं-धुआं है। मगर उस धुएं ने तुम्हारी भीतर की आंख को छिपा लिया है। जैसे बादल आ जाएं और सूरज छिप जाए। बादल छंट जाएं और सूरज प्रकट हो जाए। बस इतना ही अर्थ है संबोधि का: बादल छंट जाएं और सूरज प्रकट हो जाए।

तुम सूरज हो। बुद्धत्व तुम्हारा स्वभाव है। मगर खूब तुमने बादल अपने चारों तरफ सजा लिए हैं! न मालूम कैसी-कैसी कल्पनाओं के बादल! न मालूम कैसी-कैसी कामनाओं के बादल! जिनका कोई मूल्य नहीं। जो कभी पूरे हुए नहीं। जो कभी पूरे होंगे नहीं। मगर तुम उस सबसे घिरे हो, जो नहीं है, और नहीं होगा; और उससे चूक रहे हो, जो है, और जो सदा है और सदा रहेगा!

संबोधि का अर्थ होता है: जो है, उसमें जीना; जो है, उसे देखना; जो है, उससे जुड़ जाना। जो नहीं है, उस पर पकड़ छोड़ देना।

अतीत नहीं है। और हम अतीत को पकड़े हुए हैं। बीत गया कल, हम कितना सम्हाल कर रखे हुए हैं। जैसे हीरे-जवाहरातों को कोई सम्हाले। राख है; अंगारा भी नहीं अब; सब बुझ चुका। जैसे कोई लाशों को ढोए। ऐसा हमारा अतीत है। और या फिर हम भविष्य की कामनाओं में उलझे हैं। शेखचिल्ली हैं हम। सोच रहे हैं: ऐसा हो, ऐसा हो, ऐसा हो जाए। कितने सपने तुम फैलाते हो! कितने सपनों के जाल बुनते हो!

और इन दो चक्कियों के पाटों के बीच, जो दोनों नहीं हैं--अतीत नहीं है, नहीं हो चुका; भविष्य नहीं है, अभी हुआ ही नहीं--इन दो नहीं के बीच जो है, वर्तमान का छोटा सा क्षण, वह दबा जा रहा है। इन दो चक्कियों के बीच में तुम्हारा अस्तित्व पिसा जा रहा है।

अतीत से और भविष्य से जो मुक्त हो गया, वह संबुद्ध है, वह बोधि को उपलब्ध हुआ। उसकी आंख खुली। उसकी आंख से धूल हटी।

लेकिन तुम धोखा देने में कुशल हो। तुम औरों को धोखा देते-देते इतने कुशल हो गए हो कि अपने को ही धोखा देने लगे हो। और औरों को धोखा दो तो कुछ ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा सकते। क्या छीन लोगे? लेकिन अपने को धोखा दो तो सब गंवा दोगे। और हर आदमी अपने को धोखा दे रहा है; अपने साथ ही वंचना कर रहा है; अपने को ही भ्रांति में रखे हुए है। मूर्च्छा हमारी अवस्था है, जब कि होनी चाहिए जागृति। लेकिन सारी दुनिया हमें एक ही पाठ सिखाती है कि धोखा मत खाना किसी और से; और सबको धोखा देना। और तुम सबको धोखा देते-देते भूल ही जाओगे कि जीवन धोखा देने में नहीं है। धोखा देने में तुम खुद धोखा खा जाओगे। दूसरों के लिए खोदे गए गड्ढे तुम्हारे लिए ही गड्ढे हो जाएंगे, उनमें तुम्हीं गिरोगे। तुम्हारे क्रोध में तुम्हीं सड़ोगे। तुम्हारी वासना में तुम्हीं गलोगे। तुम्हारी आकांक्षाएं तुम्हारी छाती पर ही पत्थर होकर बैठ जाएंगी। तुम्हारी आकांक्षाओं में किसी और के जीवन का विनाश नहीं हो रहा है, तुम्हारा हो रहा है।

लेकिन छोटे-छोटे बच्चों को भी हम धोखा सिखा रहे हैं। हम सोचते हैं यही दुनियादारी है। यहां जीवन का संघर्ष है। यहां हरेक हरेक से जूझ रहा है।

मुल्ला नसरुद्दीन का बेटा फजलू पहले दिन ही स्कूल से देर से लौटा। रास्ते में होता होगा मदारी का खेल, देखने में लग गया होगा। बड़े-बड़े मदारियों के खेल में लगे हैं, छोटे बच्चों का क्या! आया घर, मुल्ला ने पकड़ा कान उसका, की पिटाई और कहा, इससे एक पाठ लो कि अब दुबारा कभी घर देर से मत आना।

दूसरे दिन समय पर आया, लेकिन कपड़े उसके गंदे थे और फटे थे। झगड़ा हो गया था खेल-खेल में। मार-पीट हो गई थी लड़कों से। मुल्ला ने फिर उसकी पिटाई की और कहा, इससे पाठ लो कि कपड़े आगे से न तो गंदे हों और न फटें। सोच-समझ कर चलो।

तीसरे दिन कपड़े तो ठीक थे, समय पर भी आया था बेटा, लेकिन स्कूल में सबसे फिसड्डी साबित हुआ था। पिछले छोर से प्रथम आया था। फिर मुल्ला ने उसकी पिटाई की और कहा, इससे पाठ लो बेटा। ऐसे नहीं चलेगा। यह जिंदगी कठोर संघर्ष है। इसमें छीना-झपटी है। ऐसे पीछे-पीछे रहे, मारे जाओगे। कुछ भी करो, ठीक कि गलत, मगर सीढ़ियां चढ़ो। आगे बढ़ो। हमेशा प्रथम रहो, चाहे कोई भी उपाय करना पड़े; येन-केन-प्रकारेण, मगर प्रथम रहना ही है।

चौथे दिन लड़का प्रसन्न चला आ रहा था। समय पर आया था, कपड़े भी नहीं फटे थे, हाथ में शिक्षक का प्रमाणपत्र भी लेकर आया था और बड़ा खुश था कि आज पिटाई नहीं होगी। मगर मुल्ला ने न आव देखा न ताव, एकदम झपटा, पकड़ी गर्दन, कर दी पिटाई। लड़का चिल्लाता ही रहा कि सुनो तो! सुनो तो! मगर तब तक तो पिटाई हो चुकी थी। लड़के ने कहा कि आप होश में हैं? आप पागल तो नहीं हो गए? न मैं देर से आया, न कपड़े फटे हैं और यह प्रमाणपत्र कि आज मैं प्रथम आया हूं कक्षा में!

मुल्ला ने कहा, इससे तुम पाठ लो बेटा कि इस संसार में न्याय कहीं है ही नहीं।

प्रत्येक व्यक्ति दीक्षित हो रहा है इस तरह। प्रत्येक व्यक्ति दीक्षित किया जा रहा है इस तरह। माता-पिता कर रहे हैं, परिवार कर रहा है, शिक्षक कर रहे हैं, पंडित-पुरोहित कर रहे हैं, राजनेता कर रहे हैं। बेईमानी, धोखाधड़ी हमारे जीवन की शैली है। इसलिए हम चूक रहे हैं उससे, जो हमारा धन है, जो हमारी वास्तविक संपदा है।

हममें से कोई भी गरीब नहीं है। हममें से कोई भी भिखारी नहीं है। परमात्मा भिखारी पैदा करता ही नहीं। परमात्मा भिखारी पैदा करना भी चाहे तो नहीं कर सकता है। परमात्मा जिसे भी बनाएगा उसे सम्राट ही बनाएगा। उसके हाथों से सम्राट ही निर्मित हो सकते हैं। तुम भी सम्राट हो। इसे जान लेना संबोधि है। तुम भी मालिकों के मालिक हो। इसे पहचान लेना बुद्धत्व है। तुम्हारे भीतर एक लोक है--अकूत संपदा का, अपरिसीम आनंद का, रहस्यों का, कि उघाड़े जाओ कितने ही, कभी पूरे उघाड़ न पाओगे। ऐसी अनंत श्रृंखला है उनकी! इतने दीये जल रहे हैं भीतर, इतनी रोशनी है, और तुम अंधेरे में जी रहे हो, क्योंकि तुम्हारी आंखें बाहर अटकी हैं। बाहर अंधेरा है, भीतर प्रकाश है। बाहर अंधकार है, भीतर आलोक है। जो भीतर मुड़ा, जिसने अपने आलोक को पहचाना, वही बुद्ध है।

बुद्धत्व प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता है, जन्मसिद्ध अधिकार है। अगर तुम चूको, तो तुम्हारे अतिरिक्त और कोई जिम्मेवार नहीं है।

और तुमने पूछा है, नरेंद्र: ‘संबोधि दिवस पर आपका संदेश क्या है?’

आनंदित होओ! आनंद बांटो! और जो आनंदित है वही आनंद बांट सकता है, स्मरण रखो। दुखी दुख ही बांट सकता है। हम वही बांट सकते हैं जो हम हैं। जो हम नहीं हैं, उसे हम चाहें तो भी नहीं बांट सकते।

इसलिए तो इस दुनिया में लोग ऐसा नहीं है कि दूसरों को सुख नहीं देना चाहते। कौन मां-बाप अपने बच्चों को दुख देना चाहता है! कौन पति अपनी पत्नी को दुख देना चाहता है! कौन पत्नी अपने पति को दुख देना चाहती है! कौन बच्चे अपने मां-बाप को दुख देना चाहते हैं!

नहीं लेकिन, तुम्हारी चाह का सवाल नहीं है। दुख ही फलित होता है। नीम लाख चाहे कि उसमें मीठे आम लगें और कांटे लाख चाहें कि गुलाब के फूल हो जाएं, चाहने से क्या होगा? मात्र चाहने से कुछ भी न होगा। तो तुम चाहते तो हो कि लोगों को आनंदित करो, लेकिन कर तुम पाते हो केवल दुखी। चाहते तो हो कि पृथ्वी स्वर्ग बन जाए, लेकिन बनती जाती है रोज-रोज नरक।

इसलिए मैं तुमसे कहना चाहता हूं, यह मेरा संदेश है: इसके पहले कि तुम किसी और को आनंद देने जाओ, तुम्हें अपने भीतर आनंद की बांसुरी बजानी पड़ेगी, आनंद का झरना तुम्हारे भीतर पहले फूटना चाहिए। मैं तुम्हें स्वार्थी बनाना चाहता हूं।

यह स्वार्थ शब्द बड़ा प्यारा है। गंदा हो गया। गलत अर्थ लोगों ने दे दिए। स्वार्थ का अर्थ होता है: स्वयं का अर्थ। अपने भीतर के अर्थ को जो जान ले, स्व के बोध को जो जान ले, वही स्वार्थी है। मैं तुमसे कहता हूं: स्वार्थी बनो! क्योंकि तुम्हारे स्वार्थी बनने में ही परार्थ की संभावना है। तुम अगर स्वार्थी हो जाओ पूरे-पूरे और तुम्हारे भीतर अर्थ के फूल खिलें, आनंद की ज्योति जले, रस का सागर उमड़े, तो तुमसे परार्थ होगा ही होगा।

इसलिए मैं सेवा नहीं सिखाता, स्वार्थ सिखाता हूं। मैं नहीं कहता कि किसी और की सेवा करो। तुम कर भी न सकोगे। तुम करोगे तो भी गलती हो जाएगी। तुम करने जाओगे सेवा और कुछ हानि करके लौट आओगे। तुम करना चाहोगे सृजन और तुमसे विध्वंस होगा। तुम ही गलत हो, तो तुम जो करोगे वह गलत होगा। इसलिए मैं तुम्हारे कृत्यों पर बहुत जोर नहीं देता। मेरा जोर है तुम पर। तुम क्या करते हो, यह गौण है; तुम क्या हो, यही महत्वपूर्ण है।

आनंदित होओ! और आनंदित होने का एक ही उपाय है--मात्र एक ही उपाय है, कभी दूसरा उपाय नहीं रहा, आज भी नहीं है, आगे भी कभी नहीं होगा--ध्यान के अतिरिक्त आनंदित होने का कोई उपाय नहीं है। धन से कोई आनंदित नहीं होता; हां, ध्यानी के हाथ में धन हो तो धन से भी आनंद झरेगा। महलों से कोई आनंदित नहीं होता; लेकिन ध्यानी अगर महल में हो तो आनंद झरेगा। ध्यानी अगर झोपड़े में हो तो भी महल हो जाता है। ध्यानी अगर नरक में हो तो भी स्वर्ग में ही होता है। ध्यानी को नरक में भेजने का कोई उपाय ही नहीं है। वह जहां है वहीं स्वर्ग है, क्योंकि उसके भीतर से प्रतिपल स्वर्ग आविर्भूत हो रहा है, उसके भीतर से प्रतिपल स्वर्ग की किरणें चारों तरफ झर रही हैं। जैसे वृक्षों में फूल लगते हैं, ऐसे ध्यानी में स्वर्ग लगता है।

मेरा संदेश है: ध्यान में डूबो। और ध्यान को कोई गंभीर कृत्य मत समझना। ध्यान को गंभीर समझने से बड़ी भूल हो गई है। ध्यान को हलका-फुलका समझो, खेल-खेल में लो। हंसिबा खेलिबा करिबा ध्यानम्‌। गोरखनाथ का यह वचन याद रखना: हंसो, खेलो और ध्यान करो। हंसते खेलते ध्यान करो। उदास चेहरा बना कर, अकड़ कर, गुरु-गंभीर होकर, धार्मिक होकर मत बैठ जाना। इस तरह के मुर्दों से पृथ्वी भरी है। वैसे ही लोग बहुत उदास हैं, और तुम और उदासीन होकर बैठ गए। क्षमा करो। लोग वैसे ही बहुत दीन-हीन हैं, अब और उदासीनों को यह पृथ्वी नहीं सह सकती। अब पृथ्वी को नाचते हुए, गाते हुए ध्यानी चाहिए, आह्लादित! एक ऐसा धर्म चाहिए पृथ्वी को, जिसका मूल स्वर आनंद हो, जिसका मूल स्वर उत्सव हो।

अब तक के सारे धर्म उदास थे। बुद्ध उदास नहीं थे, न क्राइस्ट उदास थे, न महावीर उदास थे। मगर उनके आस-पास जो लोग इकट्ठे हुए, वे सब उदास लोग थे। उनके आस-पास जो लोग इकट्ठे हुए, वे सब बीमार थे। वे गलत कारणों से उनके पास इकट्ठे हो गए थे। इसमें उनका कोई कसूर भी नहीं है। अब बुद्ध करें भी क्या? और अक्सर ऐसा होता है कि जब भी कोई बुद्धपुरुष होगा, तो सब तरह के विक्षिप्त, सब तरह के रुग्ण, सब तरह के मानसिक बीमारियों से ग्रस्त लोग उसके आस-पास इकट्ठे होने लगेंगे। इस आशा में कि होगा कोई चमत्कार! इस आशा में कि और कहीं तो कोई चिकित्सा न हो सकी, अब शायद चिकित्सा हो जाए! अब शायद बुद्ध में मिल जाए चिकित्सक! शायद बुद्ध के वचनों में मिल जाए औषधि!

पंडित इकट्ठे होंगे। क्योंकि बुद्ध के वचनों की खबर दूर-दूर तक फैलने लगेगी। और पंडित इसी उत्सुकता में रहता है कि सूचनाएं इकट्ठी करे। पंडित को ज्ञान से कोई प्रयोजन नहीं है, न ध्यान से प्रयोजन है। वह सूचना का संग्राहक है। बस सूचनाएं इकट्ठी करता है। सुंदर-सुंदर वचन इकट्ठे करता है, सुभाषित इकट्ठे करता है। खुद तो भीतर जैसा है वैसा ही रहता है; स्मृति में संजो लेता है प्यारे वचनों को, कंठस्थ कर लेता है। फिर यही पंडित बाद में उत्तराधिकारी हो जाता है। बुद्ध के जाने के बाद यही उनके वचनों को दोहरा सकता है। यही उनकी धरोहर का मालिक होता है।

और वे रुग्ण लोग जो बुद्ध के पास आए थे--वे उदास लोग, बीमार लोग, हारे-थके लोग, पलायनवादी, जो घबरा गए थे और भाग गए थे, जो जिंदगी में जीत न सके थे और संघर्ष करने की जिनकी क्षमता भी न थी, जो कायर थे--वे इकट्ठे हो गए थे। उन कायरों की जमात धर्म बनती है। और वे ही फिर धर्म की व्याख्या करेंगे, धर्म को अर्थ देंगे।

तो जीसस और जीसस के पीछे बने हुए धर्म में जमीन-आसमान का फर्क होता है। महावीर में और जैन धर्म में दुश्मनी होती है। बुद्ध में और बौद्धों में कोई नाता नहीं है, कोई मैत्री नहीं है।

और फिर यह जो पंडित और पागल और उदासीन और पलायनवादी लोगों का समूह इकट्ठा खड़ा होता है, यह हजार तरह के उपद्रव खड़े करता है। यह एक-दूसरे से लड़वाता है। हिंदू मुसलमान से लड़ते हैं। मुसलमान ईसाइयों से लड़ते हैं। सब एक-दूसरे की गर्दन काटने में लगे रहते हैं। समय कहां, फुरसत कहां कि अपने भीतर झांकें! पहले दूसरों का सफाया करना है, पहले सारी पृथ्वी पर अधिकार करना है।

तो धर्म राजनीति बन जाता है। जहां भी बीमार आदमी होंगे वहां राजनीति आ जाएगी। राजनीति बीमार आदमी की दुर्गंध है और धर्म स्वस्थ मनुष्य की सुगंध है। मगर जब भी स्वस्थ मनुष्य होता है कोई, तो यह उपद्रव होना शुरू हो जाता है।

मैंने सुना है कि शैतान के शिष्य एक दिन भागे हुए शैतान के पास पहुंचे और उन्होंने कहा, मालिक, जल्दी करो! जल्दी करो! पृथ्वी पर एक आदमी को फिर सत्य उपलब्ध हो गया है। एक आदमी फिर बुद्धत्व को उपलब्ध हो गया है।

शैतान ने कहा, तू घबड़ा मत, चिंता न कर। कोई जल्दी नहीं है।

शैतान का शिष्य बोला, जल्दी नहीं है? अगर उसने सत्य की उदघोषणा कर दी तो हमारा सारा कारोबार बंद हो जाएगा!

शैतान ने कहा, अरे पागल! हमने पंडित बिठा रखे हैं, पुरोहित बिठा रखे हैं, वे उसे सत्य की घोषणा करने देंगे तब न! वे पहुंच चुके हैं। वे चारों तरफ इकट्ठे हैं। उन्होंने उसके वचनों की व्याख्या करनी शुरू कर दी है। वह कुछ भी कहे, पंडित उसकी व्याख्या कर रहे हैं कि यही तो उपनिषद में लिखा है, यही गीता में लिखा है, यही तो शास्त्रों का सार है। वे शास्त्रों में सब डुबा देंगे उसके सत्य को। तुम फिकर मत करो। हमारा काम पंडित सदियों से करते रहे हैं। हमें खुद सीधे जाने की जरूरत नहीं है। और सब तरह के पागल इकट्ठे हो गए हैं। जल्दी ही वहां सब तरह की राजनीति चलेगी, प्रतियोगिता चलेगी, गलाघोंट प्रतियोगिता पैदा होगी। और जल्दी ही वे एक-दूसरे से लड़ेंगे, एक-दूसरे को मारेंगे, काटेंगे, पीटेंगे। और सदियां बीत जाती हैं, उपद्रव जारी रहते हैं।

यहूदियों ने जीसस को सूली दी, दो हजार साल हो गए, मगर संघर्ष अभी भी खतम नहीं हुआ है। यहूदी अभी भी जीसस को ज्ञानी मानने को तैयार नहीं हैं। यहूदियों के पंडित मानने दें तब न! जीसस जैसे प्यारे व्यक्ति को भी यहूदी ज्ञानी मानने को राजी नहीं हो पाते। यहूदियों का कसूर नहीं है। वे बीच में खड़े हुए पंडित हैं, पुरोहित हैं। वे व्याख्या कर रहे हैं कि यह जीसस खतरनाक आदमी है। इसने तो भ्रष्ट किया। इसने तो हमारे शास्त्रों को तहस-नहस कर दिया। इसने हमारी परंपरा को उखाड़ दिया। इसके कारण ही तो हम बरबाद हुए हैं।

और स्वभावतः ईसाई दुश्मन हैं यहूदियों के, दो हजार साल से बदला ले रहे हैं। एक आदमी को सूली क्या लगा दी थी, लाखों लोगों को सूली लगा दी है ईसाइयों ने। बदला अभी तक चुका ही नहीं। बदला चलता ही जा रहा है। यहूदी दो हजार साल से सूली पर लटके हुए हैं। एक आदमी को सूली पर लटकाने का फल भोग रहे हैं।

मैंने सुना है, अमरीका में यह घटना घटी। दो हिप्पी--महाहिप्पी कहना चाहिए--बहुत भूखे थे, पैसा पास न था। कुछ और उपाय सूझता न था। लेकिन देखने-दाखने में, बाल लंबे थे, दाढ़ी थी, बिलकुल जीसस जैसे मालूम होते थे। तो उन्होंने सोचा कि एक उपाय करें। रविवार का दिन था, भूख जोर से लगी थी, चर्च के पास से गुजरते थे, सोचा कि चलें भीतर। प्रोटेस्टेंट चर्च था। तो उन्होंने एक तैयारी की, एक नाटक रचा। एक युवक ने दो लकड़ियां जोड़ कर क्रॉस बनाया, उसको कंधे पर रखा, वह पीछे हुआ और एक युवक आगे। पहला युवक अंदर प्रविष्ट हुआ और उसने कहा, रास्ता दो, प्रभु का आगमन हो गया है! महाप्रभु आ रहे हैं, रास्ता दो!

ईसाइयों ने देखा, बिलकुल जीसस जैसे आदमी मालूम हो रहे थे। एकदम पैरों पर गिर पड़े। सूली भी लिए हुए हैं! जल्दी से दान लोगों ने दिया। कोई चालीस-पचास डालर इकट्ठे हुए। बड़े खुश हुए। दोनों बाहर निकले। उन्होंने कहा, यह तो बड़ा गजब का काम है, यह धंधा अच्छा है! एक सप्ताह चल जाएगा। दूसरे सप्ताह दूसरे चर्च में।

दूसरे सप्ताह एक कैथलिक चर्च के सामने पहुंचे। वही ढंग। अब थोड़ा और भी संवार लिया था ढंग को, अभ्यास भी कर लिया था। पहला युवक भीतर घुसा, उसने जोर से घोषणा की: सावधान! जो वचन दिया था वह पूरा हो रहा है। प्रभु का आगमन हो चुका है! वे आ रहे हैं, रास्ता दो! और तब दूसरा युवक सूली लिए हुए भीतर प्रविष्ट हुआ।

तहलका मच गया। स्त्रियां तो गश खाकर गिर गईं। पुरुषों ने एकदम चरण पकड़ लिए। नोटों की वर्षा हो गई। कोई सौ-डेढ़ सौ डालर लेकर दोनों बाहर निकले। बड़े खुश थे कि यह तो बड़ा गजब का काम हुआ। पहले से क्यों नहीं सूझा!

तीसरी बार सोचा, मजाकिया, कि चलो जरा इस बार यहूदियों के सिनागॉग, उनके मंदिर में चलें, वहां क्या होता है! पैसे काफी थे, दो-तीन सप्ताह चलेगा, अभी जल्दी भी नहीं थी। यहूदी क्या व्यवहार करते हैं, जरा देखें! वही किया उन्होंने। पहले व्यक्ति ने जाकर आवाज दी कि सावधान! प्रभु आ गए हैं। जो वचन उन्होंने दिया था वह पूरा किया जा रहा है! और दूसरा युवक सूली लिए भीतर प्रविष्ट हुआ।

यहूदियों के बूढ़े पुरोहित ने चश्मे के ऊपर से गौर से देखा और अपने युवक सहयोगी को कहा कि जा खीलियां ला, हथौड़ी ला। मालूम होता है यह हरामजादा फिर आ गया!

दो हजार साल हो गए, मगर यहूदी क्षमा नहीं कर सके अभी तक। कभी नहीं करेंगे। वे पुरोहित करने नहीं देंगे।

धर्म तो एक है! धर्म दो कैसे हो सकते हैं? जब विज्ञान ही दो नहीं होते, जब पदार्थ का विज्ञान तक एक होता है, तो चैतन्य का विज्ञान तो कैसे अनेक हो सकता है?

पृथ्वी पर तीन सौ धर्म हैं और तीन सौ धर्म के कम से कम तीन हजार उपधर्म हैं, और कम से कम तीन लाख उन उपधर्मों के छोटे-छोटे संप्रदाय हैं। इतने छोटे-छोटे संप्रदाय कि उनके नाम भी याद रखना मुश्किल है।

अब एक मित्र बार-बार पूछे जाते हैं कि आप यह बताइए, गहोई समाज का किसने निर्माण किया?

एक दूसरे सज्जन आ गए हैं, वे प्रश्न पूछते हैं कि विश्नोई समाज का कौन जन्मदाता था? आप महावीर पर बोलते हैं, बुद्ध पर बोलते हैं, कृष्ण पर बोलते हैं, क्राइस्ट पर बोलते हैं, मोहम्मद पर बोलते हैं; आप हमारे भगवान जंभेश्वरनाथ पर क्यों नहीं बोलते? जंभेश्वरनाथ ने विश्नोई समाज का निर्माण किया था।

जरूर किया होगा। एक से एक उपद्रव, कितने उपद्रव चल रहे हैं! और उनको फिक्र नहीं है समझने की कुछ। जो गहोई है, उसको फिक्र यह पड़ी है कि गहोई का क्या अर्थ है? जो विश्नोई है, उसको--विश्नोई का क्या अर्थ है? सबको अपनी-अपनी पड़ी है। सत्य से किसी को लेना-देना नहीं है। और सत्य एक है--न गहोई, न विश्नोई। और वह सत्य एक तुम्हारे भीतर छिपा है--न वेद में है, न कुरान में है, न बाइबिल में है। ध्यान से उस सत्य को खोजो।

ध्यान का अर्थ है: शांत होओ, मौन होओ, भीतर जागो! तुम भी संबुद्ध हो सकोगे। जरा सा श्रम चाहिए। जरा सा रुख परिवर्तन चाहिए। जितनी शक्ति तुम बाहर दौड़ने में लगा रहे हो, जितनी शक्ति तुम व्यर्थ की चीजों को संगृहीत करने में लगा रहे हो, उसका दसवां हिस्सा भी अगर तुम भीतर बैठने में लगा दो तो क्रांति हो जाए। तो हजार-हजार सूरज तुम्हारे भीतर भी ऊग आएं! तुम्हारे भीतर भी नृत्य हो, संगीत हो। तुम्हारे भीतर भी आनंद के फव्वारे फूटें, हंसी की फुलझड़ियां छूटें, रास-महारास रचे! तुम्हारे भीतर भी फाग हो, रंग झरें, पिचकारियां भरी जाएं, गुलाल उड़े!

ऐसे ही मर जाना है? जीवन को बिना जाने मर जाना है?

अधिक लोग ऐसे ही मर जाते हैं। जीते ही नहीं और मर जाते हैं। इतना ही कस्द करो कि बिना जीए नहीं मरेंगे, जीवन को जान कर ही विदा होंगे। और आश्चर्य की बात तो यह है कि जो जीवन को जान लेता है, उसकी फिर कोई मृत्यु नहीं है। जीवन को जान लिया तो प्रभु को जान लिया, तो शाश्वत को जान लिया, तो सत्य को जान लिया। सत्य कहो, शाश्वत कहो, प्रभु कहो, निर्वाण कहो, बुद्धत्व कहो--ये सब एक ही घटना के अलग-अलग नाम हैं। इन नामों में मत उलझ जाना।

मेरा तो एक ही छोटा सा सूत्र है, छोटा सा संदेश है: भीतर डुबकी मारो। जितने गहरे जा सको, जाओ--अपने में! वहीं पाओगे जो पाने योग्य है। और उसे पाकर निश्चित ही बांट सकोगे। पृथ्वी तुम्हारे हंसी के फूलों से भर सकती है।

दूसरा प्रश्न:

भगवान, जैसा आपने कहा कि जब हम सब जाग जाएंगे, उस दिन आप हंसेंगे। क्या इसका यह अर्थ नहीं हुआ कि हम आपको कभी हंसते नहीं देख सकेंगे?

शीला,

ऐसा उदास अर्थ लेने की क्या जरूरत है? क्यों नहीं तुम सब जाग सकोगे? इतने निराशावादी होने का क्या कारण है? यही तो मेरी सारी चेष्टा है कि तुम्हारे भीतर आशा जगे; तुम्हारी आशा के बीज अंकुरित हों।

मुल्ला नसरुद्दीन के दो बेटे हैं--एक आशावादी, एक निराशावादी। परेशान है। एक मनोवैज्ञानिक से सलाह ली कि क्या करूं। मनोवैज्ञानिक ने कहा, ऐसा करो, यह दीवाली आ रही है। जो आशावादी है, उसको एक कमरे में रखो और कमरे में घोड़े की लीद ही लीद भर दो। क्योंकि अति आशावादी होना ठीक नहीं है। लीद की बदबू और कमरे में लीद ही लीद देख कर थोड़ी तो निराशा पैदा होगी ही, कि यह क्या भेंट दी पिताजी ने दीवाली की! यह कोई भेंट है! उससे थोड़ा संतुलन आएगा। और जो निराशावादी है, उसके कमरे में फूल ही फूल सजा दो, दीये ही दीये जला दो, फुलझड़ियां ही फुलझड़ियां, पटाखे, खेल-खिलौने, मिठाइयां, जो भी सुंदर तुम पा सको बाजार में, सब खरीद कर उसके कमरे में भर दो। देखें फिर वह क्या और कैसे अपनी निराशा को सम्हालता है! उसमें थोड़ी आशा जगेगी कि नहीं, जिंदगी में रस भी है, मजा भी है। इस तरह दोनों अपनी अतियों से हट जाएं, मध्य में आ जाएं।

मुल्ला को बात जंची। उसने यही किया। दो घंटे बाद गया पहले कमरे में, जिसमें फूल सजाए थे, दीये जलाए थे, खिलौने रखे थे; और निराशावादी बेटे को छोड़ा था। निराशावादी बेटा बीच में पद्मासन लगाए बैठा था--बिलकुल उदास, आंसू टपक रहे थे।

उसने पूछा कि बेटा, तू रो रहा है? मिठाइयां वैसी की वैसी रखी हैं, खिलौने तूने छुए नहीं, फुलझड़ियां-पटाखे वैसे के वैसे रखे हैं। मामला क्या है?

उस बेटे ने कहा, मैं रो रहा हूं! मैं रो रहा हूं इसलिए कि मिठाइयों से क्या होगा? अरे जरा सा स्वाद और फिर पेट में दर्द और फिर बदहजमी। ये कष्ट मैं बहुत भोग चुका, अब धोखे में आने वाला नहीं हूं। ये मिठाइयां नहीं हैं, जहर हैं।

और बाप ने कहा, और इतने सुंदर फूल?

उसने कहा, कितनी देर लगेगी मुरझाने में? अभी हैं, अभी मुरझा जाएंगे! इनका क्या भरोसा? अरे क्षणभंगुर हैं!

नसरुद्दीन भी मुश्किल में पड़ा कि इससे करो क्या! और उसने कहा कि ये खेल-खिलौने?

उसने कहा, खेल-खिलौनों का क्या है, छुए कि टूटे। खेल ही खिलौने हैं!

और फुलझड़ी-पटाखे?

उसने कहा, क्या हाथ-पैर जलवाने हैं? अखबारों में देखते नहीं कि हर दीवाली पर कितने बच्चे मर जाते हैं! तुम क्या मेरी जान लेने के पीछे पड़े हो? इसीलिए तो मैं रो रहा हूं कि यह बाप है कि हत्यारा है!

एक उदास आदमी का दृष्टिकोण है। उसको तुम कुछ भी दे दो, वह उदासी खोज लेगा। उसे गुलाब की झाड़ी के पास ले जाओ, वह कांटे गिनेगा, फूल नहीं। उदास आदमी से पूछो, वह कहेगा: क्या रखा है दुनिया में! अरे दो रातों के बीच में एक छोटा सा दिन। और दो लंबी रातें! क्या सार है! जनम के पहले अंधेरा, मृत्यु के बाद अंधेरा; अरे चार दिन की जिंदगी, इसमें रखा क्या है! यूं कट जाएगी। पानी की लहर है जिंदगी तो। और तुम्हारे साधु-महात्मा भी इसी वर्ग के हैं, निराशावादी, जिन्हें जीवन में सब जगह कांटे दिखाई पड़ेंगे, अंधेरा दिखाई पड़ेगा; जो कसम लिए बैठे हैं कि फूल देखेंगे ही नहीं, और देखेंगे भी तो फूल में भी दोष खोज लेंगे।

फिर उसने सोचा कि देखूं आशावादी का क्या हुआ? उस बेचारे पर उसे भी दया आ रही थी कि इस मूरख के लिए मैंने इतना किया और इसने यह जवाब दिया, उसकी क्या हालत है? थोड़ा डरा भी कि कहीं एकदम मार-पीट पर उतारू न हो जाए। क्योंकि जब यह रो रहा है और कह रहा है कि तुम क्या हत्यारे हो! तो उसके कमरे में तो लीद ही लीद भरी है।

मगर जब उसने उसका कमरा खोला तो दंग रह गया। वह तो लीद को उछाल रहा है और अंदर घुस कर लीद के कुछ खोज रहा है और इतना आनंदित हो रहा है। नसरुद्दीन ने पूछा कि क्या हो रहा है, तू इतना खुश क्यों हो रहा है?

उसने कहा कि जहां इतनी लीद है वहां घोड़ा भी कहीं न कहीं होगा! मैं घोड़े को खोज रहा हूं! आओ तुम भी। अरे खोजने से क्या नहीं मिलता! जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ!

शीला, तू भी खूब पागल है! तू कह रही है कि ‘जैसा आपने कहा कि जब हम सब जाग जाएंगे, उस दिन आप हंसेंगे...’

तो क्यों नहीं जाग जाएंगे सब? जब सब सो सकते हो तो जाग क्यों नहीं सकते? जब सब रो सकते हो तो हंस क्यों नहीं सकते? यही आंखें रोती हैं, यही आंखें हंसती हैं। यही आंखें सोती हैं, यही आंखें जागती हैं।

नहीं, निराश होने का कोई कारण नहीं है। और घबड़ाओ मत, यह घड़ी आएगी। इस घड़ी को आना ही पड़ेगा। जरा श्रम करना जरूरी है। और जहां इतने प्रतिभाशाली लोग इकट्ठे हुए हैं...मैं अपने को सौभाग्यशाली मानता हूं, क्योंकि शायद इतने प्रतिभाशाली संन्यासी किसके पास होंगे! इतने युवा, इतने ऊर्जा से भरे हुए लोग किसके पास होंगे! हम इस पूरी पृथ्वी को हंसी से भर दे सकते हैं।

और वह तो मैंने प्रतीक की बात कही। प्रतीकों को जोर से नहीं पकड़ लेना चाहिए। प्रतीक तो केवल इशारे हैं। वह तो मैंने तुम्हें एक प्रलोभन दिया कि देखो जल्दी जागो, अगर मुझे हंसता देखना है। चलो, इसी बहाने जागो।

नहीं जागोगे, जिद ही कर रखी होगी तुमने, तो भी मैं हंसूंगा--तो हंसूंगा इस बात पर कि गजब के लोग थे! हठयोगी थे! कसम खाकर ही पैदा हुए थे कि चाहे कुछ भी हो जाए, हिलेंगे-डुलेंगे नहीं; चाहे लाख हिलाओ-डुलाओ, करवट नहीं लेंगे, आंख नहीं खोलेंगे। कितना ही चिल्लाओ, कितना ही पुकारो, सुन भी लेंगे तो अनसुनी कर देंगे। होश में भी आ जाएंगे तो कहे जाएंगे कि हम बेहोश हैं।

वह तो मैंने प्रतीक की बात कही। तुम्हें प्रलोभन दिया। एक संकेत। हंसता तो अभी भी हूं। नहीं हंस सकता हूं यहां, उसका इतना ही कारण नहीं है कि तुम जब सब जागोगे तभी हंसूंगा। असल में चुटकुले कहने का राज और कीमिया यही है कि कहने वाला न हंसे। अगर कहने वाला हंस दे तो सुनने वाले चुप हो जाते हैं।

ऐसा कहा जाता है: अगर किसी अंग्रेज से चुटकुला कहो तो वह दो बार हंसता है। पहली बार शिष्टाचारवश। समझ में उसकी कुछ आता नहीं। अंग्रेज होता है अकड़ा हुआ आदमी। हंसने के लिए थोड़ा विराम, थोड़ा विश्राम, थोड़ा हलका-फुलका होना चाहिए। अंग्रेज हलका-फुलका नहीं होता, भारी-भरकम होता है। सारी पृथ्वी का भार ही वह लिए हुए है। व्हाइट मेन्स बर्डन! वह हंसे तो कैसे हंसे! लेकिन होता शिष्टाचारी है। बहुत शिष्टाचारी होता है। अगर तुमने कुछ मजाक की बात कही तो हंसेगा--कि तुम्हें बुरा न लग जाए। इतना शिष्टाचारी होता है कि मैंने सुना है, एक बुढ़िया रास्ते से जा रही थी लंदन के। एक कार वाला रुका, बूढ़ी स्त्री को देख कर उसने कहा कि मां, तू बैठ जा। कहां उतरना है, मैं उतार दूंगा। वह बैठ गई। दो मील चलने के बाद उसने पूछा कि तुझे कहां जाना है वहां मैं छोड़ दूं! उस बुढ़िया ने कहा, बेटे, अब तू पूछता है तो कहती हूं। जाना तो मुझे दूसरी तरफ था। तो उसने कहा, माई, फिर बैठ क्यों गई? उसने कहा, शिष्टाचारवश! तूने इतने प्रेम से कहा, तो अंग्रेज हूं, नहीं नहीं कही जाती।

तो अंग्रेज दो बार हंसता है--एक बार शिष्टाचारवश और दूसरी बार जब आधी रात को उसे नींद नहीं आती और मजाक समझ में आती है पड़े-पड़े, तब हंसता है कि अरे, सो यह था मतलब! जरा देर से आती है।

अमरीकन्स के संबंध में कहा जाता है कि तुम उनसे मजाक की बात कहो, वे तत्क्षण हंसते हैं। क्योंकि वे तत्क्षण समझते हैं, देर-दार नहीं करते, देर-दार का काम भी नहीं है।

और जर्मनों के संबंध में कहा जाता है कि वे भी दो बार हंसते हैं--पहली बार शिष्टाचारवश, जैसा अंग्रेज हंसता है और दूसरी बार जब वे उसी मजाक को बिना समझे किसी और को सुनाते हैं। दूसरा तो नहीं हंसता, मगर वे हंसते हैं और हैरान होते हैं कि दूसरा हंस क्यों नहीं रहा, बात क्या है!

और यहूदियों के संबंध में कहा जाता है: तुम उनसे कोई मजाक सुनाओ, वे कहते हैं, बहुत पुरानी है। और दूसरी बात, तुम सब उलटी-सीधी सुना रहे हो। हंसने की तो बात ही दूर और उलटे डांटते हैं कि यह मजाक बहुत पुरानी है। और दूसरी बात, तुम उलटी-सीधी सुना रहे हो, तुम्हें ठीक से सुनाना भी नहीं आता।

अलग-अलग जातियां अलग-अलग तरह का व्यवहार करती हैं मजाक के साथ। भारतीयों के पास तो अपने कोई मजाक ही नहीं हैं। एक ऐसा मजाक नहीं जो भारतीयों का अपना हो। हो ही नहीं सकता। वेदांत से फुरसत मिले तब न! वेदांत की चर्चा करते-करते दांत ही गिर जाते हैं। फिर हंसो तो और भद्द होती है। यहां तो गंभीर बातें होती हैं, ब्रह्मचर्चा होती है।

तो ऐसा नहीं कि मैं नहीं हंसता हूं, मगर अदृश्य। हंसता तो जरूर हूं, लेकिन नियमानुसार, जब मजाक की कोई बात कही जा रही हो तो हंसना नहीं चाहिए। सो नियम का पालन करता हूं। एक ही नियम का तो जीवन में पालन करता हूं! और शीला, तू उसको भी तोड़ने पर पड़ी है। और तो मेरे जीवन में कोई नियम है ही नहीं।

लेकिन कभी-कभी ऐसा मजाक भी कहने का मौका आ जाता है, बहुत मुश्किल से कभी-कभी, जब अपने को नहीं रोक पाता। बड़ी मुश्किल हो जाती है। तब मुझे पता चलता है कि संयम कितनी कठिन चीज है। जैसे इस कहानी में! जब भी यह कहानी मैंने कही है, तो मैंने मन ही मन संयमों को, संयमी लोगों को सिर झुका कर नमस्कार किया है।

कहानी सीधी-सादी है। नाम शायद तुमने सुना हो: चूहड़मल-फूहड़मल सिंधी! यह तो पूर्व-नाम है। अब तो लोग उनको दादाजी करके जानते हैं। सिंधियों के गुरु हैं। उल्हासनगर निवासी। हैं चमत्कारी। पहले उल्हासनगर में ही रहते थे और मेड इन यू.एस.ए. चीजें बनाते थे। फाउंटेन पेन, बैटरी, जो भी चीज बनाते--मेड इन यू.एस.ए.। किसी ने पूछा कि रहते उल्हासनगर में, बनाते मेड इन यू.एस.ए. चीजें! चूहड़मल-फूहड़मल ने कहा कि यू.एस.ए. पर कोई अमरीका का कब्जा है? कोई ठेका ले लिया है अमरीका ने? यू.एस.ए. किसी के बाप का है? अरे यू.एस.ए. का कोई एक ही मतलब थोड़े ही होता है। यू.एस.ए. का मतलब होता है: उल्हासनगर सिंधी एसोसिएशन।

फिर यू.एस.ए. का माल बनाते-बनाते थक गए, जैसा कि इस देश में सभी लोग आखिर थक जाते हैं। धोखाधड़ी करते-करते थक जाते हैं तो महात्मा हो गए, संन्यासी हो गए। एक जगह वेदांत की चर्चा कर रहे थे। शायद पूना में ही कर रहे हों। चंदूलाल की पत्नी भी अपने बेटे को लेकर सुनने गई थी। और बेटा बीच-बीच में बार-बार कह रहा था कि मम्मी, पेशाब करने जाना है। और बेचारी मम्मी, अब वेदांत की चर्चा चलती, ब्रह्म की चर्चा चलती, तो वह उसको डांट देती थी कि चुप रह, ऐसी बात नहीं करते। मगर वह चुप भी कैसे रहे! आखिर उसने कहा कि मम्मी, जाने देती हो कि नहीं, फिर मेरे वश में न रहेगा। अब मेरा संयम टूटा जा रहा है।

चूहड़मल-फूहड़मल भी सुन रहे थे। उन्होंने कहा कि बाई, ले जा। और अपने बेटे को कुछ समझा। धर्मचर्चा में ऐसे शब्दों के उपयोग नहीं करते।

तो चंदूलाल की पत्नी ने कहा, फिर क्या करें? बच्चे हैं।

बच्चे हैं जरूर, मगर इनको समझा दे। एक प्रतीक बना दिया; जैसे कि बच्चे को समझा दे कि जब भी तेरे को ‘पेशाब करना है’, ऐसा कहना है; ऐसा नहीं कहना, कहना कि भजन करना है। सो कोई समझ भी न पाएगा। और धर्मचर्चा चल रही है, लोग भी सुनेंगे, प्रसन्न होंगे कि बेटा भी कैसा धार्मिक है। और तू समझ जाएगी। कोड-वर्ड!

जंचा चंदूलाल की पत्नी को। उससे बेटे को समझा दिया। छह महीने गुजर गए। फिर दादाजी आए, चंदूलाल के घर ही ठहरे। उसी रात कोई चंदूलाल के रिश्तेदार मर गए तो पत्नी को जाना पड़ा। तो बेटे को दादाजी के पास सुला गई, कि इसे सुलाए रखना। आधी रात को बेटे ने कहा हिला कर, दादाजी, दादाजी! भजन गाना है।

आधी रात को नींद खोलो तुम किसी की...दादाजी ने कहा, चुप! यह कोई वक्त है भजन गाने का? सुबह ब्रह्ममुहूर्त में गाना।

उस लड़के ने कहा, ब्रह्ममुहूर्त तक नहीं रुक सकते। भजन अभी गाना है।

दादाजी ने कहा, तू पागल है क्या? अरे आधी रात को न सोएगा न सोने देगा! चुपचाप सो जा। अगर बोला तो ठीक नहीं होगा।

थोड़ी देर बेटा चुप रहा। उसने फिर--जब तक नींद लग गई दादाजी की--फिर हिलाया। उसने कहा कि नहीं दादाजी, मैं नहीं रुक सकता। मैं तो भजन गाकर रहूंगा।

दादाजी ने कहा, हद हो गई! तू गाएगा भजन, मुझको जगाएगा, मुहल्ले-पड़ोस के लोग जग जाएंगे। और लोग क्या कहेंगे! अरे भजन कोई ऐसी चीज थोड़े ही है कि हर कभी गाना!

लड़के ने कहा, तलफ लगी है!

दादाजी ने अपना सिर पीट लिया कि कहां के मूरख से पाला पड़ा है! भूल ही भाल गए अपना महात्मापन। कहा कि बदतमीज, हरामजादे, यह कोई वक्त है?

लड़के ने कहा, गाली दो या कुछ भी करो, या तो गाने दो या बोलो!

दादाजी भी एक ही थे, उन्होंने कहा कि नहीं गाने दूंगा यह बेवक्त का काम।

लड़के ने कहा कि फिर मैं कहे देता हूं, भजन निकल जाएगा! बिलकुल निकलने के करीब है! फिर मत कहना कि भजन में भिगा दिया!

दादाजी ने कहा, हद हो गई! भजन में भिगा दिया, क्या कह रहा है तू! नहीं मानता भैया तो ऐसा कर, धीरे से मेरे कान में गा दे।

लड़के ने कान में भजन गा दिया। जब कुनकुना-कुनकुना भजन दादाजी के कान में पड़ा तब उनको अकल आई, कि मारे गए! उचक कर खड़े हो गए। कहा कि तेरा बाप चंदूलाल, वह भी मूरख है, तेरी मां मूरख और तू महामूरख है! अरे इसको भजन कहते हैं? अधर्म की हद हो गई! नास्तिकता की हद हो गई!

उस लड़के ने कहा, मैंने तो पहले से ही कहा था दादाजी, कि अगर नहीं माना तो भिगो दूंगा। और यह कोई रुकने वाली चीज नहीं है कि ब्रह्ममुहूर्त तक रुक जाए। और यह भी बता दूं कि आपने ही छह महीने पहले मेरी मम्मी को समझाया था।

तब दादाजी को याद आया।

प्रतीक कभी-कभी महंगे पड़ जाते हैं। प्रतीक कभी-कभी मुश्किल के हो जाते हैं। यह तो मैंने प्रतीक की बात कही। इसका तुम ऐसा मतलब मत समझ लेना कि मैं हंसूंगा ही नहीं। तुम नहीं हंसे तो इस बात पर हंसूंगा। तुम हंसे, तुम जागे, तो तुम्हारे जागरण पर।

मैं तो हंस ही रहा हूं। मेरा आनंद तो चल ही रहा है--अहर्निश। तुम्हें भी उसमें सम्मिलित कर लेना चाहता हूं। यह संन्यास उसके लिए ही निमंत्रण है।

और यह जो मैं कह रहा हूं ये सब तो प्रतीक हैं। इनको जड़ता से मत पकड़ लेना। कई पत्र आ गए मेरे पास कि आपकी बात सुन कर हम बहुत उदास हो गए।

क्या खाक तुम उदास होओगे! तुम पहले ही से इतने उदास हो कि मैं तो नहीं समझता कि और उदास हो सकते हो। सिद्धार्थ ने लिखा है कि आपकी बात सुन कर मैं तो बहुत उदास हो गया।

अब सिद्धार्थ की शक्ल मैं याद करता हूं, मैं नहीं सोच सकता कि यह सिद्धार्थ और कैसे उदास हो सकते हैं! इससे ज्यादा भी उदासी हो सकती है? सिद्धार्थ तो बिलकुल उदासीन साधु हैं। कहीं किसी और साधुओं की जमात में होते तो महात्मा हो जाते। यहां बेचारों को कोई पूछता नहीं। यहां तो हिसाब ही उलटा है, यहां तो उलटी खोपड़ियां जुड़ी हैं। यहां का गणित और है।

और भी पत्र आ गए कि इसका तो यही अर्थ होगा कि आपको हम कभी हंसते न देख सकेंगे।

तुम जब हंस रहे हो तो मैं तुममें हंस रहा हूं। मेरे संन्यासी मेरे हाथ हैं। मेरे संन्यासी मेरे प्राण हैं।

रामकृष्ण जब मर रहे थे, उनको गले का कैंसर हुआ था, भोजन नहीं ले सकते थे, पानी नहीं पी सकते थे। विवेकानंद ने उनसे कहा कि परमहंसदेव, आप परमात्मा से इतना नहीं कह सकते? जरा सी बात है, आप कह भर दें कि हो जाएगी। आपकी कही बात और टाली जाए, यह तो नहीं हो सकता। जरा सी बात है, आप कह दें कि यह क्या कर रहे हो? कम से कम भोजन तो करने दो! पानी तो पीने दो!

विवेकानंद ने कहा, तो रामकृष्ण तो बहुत सीधे-सादे भोले आदमी थे, उन्होंने आंख बंद की। आंख खोली और कहा कि देख, तूने ऐसी बात की, तेरी बात मान कर मैंने कहा, तो परमात्मा ने मुझे बहुत झिड़का और मुझे कहा कि सुन, तू अपने ही गले पर भरोसा किए जाएगा? कब तक? तो तेरे शिष्यों के गलों से कौन भोजन कर रहा है? उनके गलों से कौन पानी पी रहा है?

तो विवेकानंद को कहा कि देख, इस तरह की सलाह मुझे मत देना अब आगे से। मैं सीधा-सादा, मान लेता हूं, तो उलटी मुझे झिड़क खानी पड़ी। और बात तो ठीक है। अब कब तक अपने ही गले से पानी पीऊंगा? अब तुम्हारे गले से पीऊंगा! अब कब तक इस देह में जीऊंगा? अब तुम्हारी देह में जीऊंगा! और परमात्मा ठीक कह रहा है। अब फैल जाऊंगा तुम सब में।

तुम जब हंसते हो तो मैं तुममें हंसता हूं। तुम्हारे कंठ मेरे कंठ हैं। संन्यस्त होने का अर्थ ही यही होता है कि मुझमें और तुममें अब कोई दूरी न रही, कोई फासला न रहा। दीवाल हटा दी हमने। बीच के सारे बंधन, सीमाएं समाप्त कर दीं। मिलन हुआ। जहां गुरु और शिष्य का मिलन है, वहीं तो संन्यास का फूल खिलता है। तुम हंसते हो तो मैं हंसता हूं। तुम नाचते हो तो मैं नाचता हूं। मुझे अलग से नाचने की, अलग से हंसने की कोई जरूरत नहीं है।

तीसरा प्रश्न:

भगवान, जब भी कोई लड़की वाला मुझे वर के रूप में देखने आता है तो मैं फौरन अपने कमरे में देववाणी ध्यान या सक्रिय ध्यान शुरू कर देता हूं। परिवार वाले इससे नाराज हैं। क्या और भी कोई सरल उपाय है?

प्रेम प्रदीप,

और कोई सरल उपाय नहीं है। यह तो सरलतम तुमने चुन लिया। यह तो बड़ा कारगर उपाय तुमने चुना। होने दो घर वालों को नाराज। एक बात पक्की है कि तुम बड़े उपद्रवों से बच जाओगे। और जान बची तो लाखों पाए, लौट के बुद्धू घर को आए! अगर घर आना है तो दिल खोल कर करो। जब भी कोई आए देखने तब चूकना ही मत। और ढीला-पोला भी मत करना, दिल खोल कर करना कि मुहल्ले वाले भी इकट्ठे हो जाएं।

फ्रांस में, इटली में, जर्मनी में युवकों को अनिवार्य रूप से सेना में भरती होना पड़ता है। अब कुछ संन्यासी हो गए। अब वे कहते हैं, हम क्या करें?

मैंने कहा, तुम फिक्र मत करो, जाओ। और जब दफ्तर में तुम्हें बुलाया जाए इंटरव्यू के लिए, तो वहीं सक्रिय ध्यान करने लगना। कुंडलिनी करना। ज्ञान-चर्चा छेड़ देना। ब्रह्मज्ञान से नीचे मत उतरना। समझ कर कि तुम पागल हो, वे खुद ही भरती नहीं करेंगे।

और यह काम दो-तीन बार तो कारगर हुआ, मगर अब जरा शक पैदा हो गया है उन लोगों को कि जो आए वही एकदम से सांसें लेने लगता है! यह मामला क्या है? दो-तीन तो बच गए। वे पूछ रहे हैं नाम और वह ले रहा है सांसें जोर-जोर से। वे पूछ रहे हैं कुछ, वह कर रहा है कुंडलिनी। तो स्वभावतः समझेंगे कि इसका मस्तिष्क ठीक नहीं है।

यह तो तुमने बिलकुल ठीक किया अपने मस्तिष्क को बचाने का उपाय। परिवार वाले दुखी होंगे जरूर, क्योंकि एक बड़ी अदभुत दुनिया है हमारी। जिस पीड़ा में वे खुद जीए हैं, उसी पीड़ा में तुम्हें भी डालना चाहते हैं। काश वे एक दफा सोच-विचार कर देखें कि उन्होंने क्या पा लिया है परिवार बना कर, विवाह करके, बच्चों की कतार लगा कर? उन्होंने क्या पा लिया है? सिवाय दुख के, सिवाय परेशानी के! मगर नहीं, मूर्च्छित हैं। सोचते हैं कि तुम्हें बसा जाएं, जैसे उनके मां-बाप उन्हें बसा गए और उनके मां-बाप उनके मां-बाप को बसा गए थे। ऐसी पीढ़ियों से चल रही है बीमारी और हर मां-बाप अपने बच्चों को दे जाते हैं।

तुम फिक्र न करो, प्रेम प्रदीप। धीरे-धीरे अपने आप लड़की वाले आएंगे ही नहीं। और अगर लड़कियों को पता चल गया तो तुम बेफिक्र रहो। तुम चाहो भी किसी दिन कि विवाह करना है, तो मुश्किल है। तब तक लड़कियां भी सक्रिय ध्यान करना सीख रही हैं, खयाल रखना।

जिंदगी में जब तक तुम्हारा स्वयं भाव न हो विवाह के अनुभव में उतरने का, तब तक उतरना ही मत। स्वयं का भाव हो तो जरूर उतरना। मैं कोई विवाह-विरोधी नहीं हूं। स्वयं का भाव हो तो जरूर उतरना। स्वयं का भाव न हो, तो दुनिया कहे तो भी मत उतरना। सावधान रहना, बचे रहना--जितनी देर तक बच सको। हां, भाव हो तो फिर एक क्षण भी बचने की जरूरत नहीं है। अगर भाव हो तो तुम विवाह करके सीखोगे। कुछ लोग अनुभव से सीखते हैं। कुछ लोग केवल दूसरों का अनुभव देख कर सीख लेते हैं।

राजस्थान के एक गांव में रामलीला हो रही थी। सूर्पणखा की नाक कटने का दृश्य आता है--

लोग, लुगाइयो

सज्जन भाइयो

थानै एक राज की बात बताऊं

रामलीला में मैं

लछमन को पारट कियो थो

बीं को इक किस्सो सुनाऊं

जे दिन सूरपणखां की नाक कटनी थी

बीं दिन मैं अकड़ो-अकड़ो सो

या सोचै थो

रे लछमन!

आज तो तेरी जयजयकार बुलेगी

पण तभी स्टैज पै बेलन आयो

अइयां लागो

जइयां कोई आने से पहलां

अपणो विजिटिंग कारड भिजवावे

और बीं बेलन के पाछै पाछै

मेरी घरवाली भी आ जावै

और लोग या सोच के

कि सूरपणखां आगी

ताली पीटी

मैं चुपके से अपणो माथो पीटो

परदा के पीछे से डायरेक्टर बोल्यो--

‘थारी घरवाली तो साचाणी

सूरपणखां लागे है

थे इनकी ही नाक काट दो’

मैं बोल्यो--

‘रे डायरेक्टर, काटनी तो दूर

मैं तो आज ताणी छुई भी कोनी’

वा कही--

‘थे लछमण बना हो

तो थानै काटनी ही पड़ेगी’

मैं पास खड़ा रामचंदर जी से बोल्यो--

‘भाया म्हारी लाज राख दै

आज ई सूरपणखां की नाक काट दै

बाद में चाहे रावण मेरा से ही मरवा लिए’

पण वा क्यूं माखी के छाता में

हाथ देवे थो

साफ नाट गियो

मैं तुलसीदास जी ने कोसन लागो--

‘रे तुलसीदास!

तू तो रामायण लिख कर चलो गियो

पण म्हारी जान ने तो महाभारत कर दी

लछमण कै तेरो दूस्मण लागै था

जो तू सगला काम तो रामचंदर जी से कराया

और नाक लछमण से कटवाई’

पण कोसबा से कै होवै थो

मैं डर के मारे थर-थर कांपण लागो

और लोग या सोच कै

कि मैं गुस्सा के मारे कांपूं हूं

ताली पीटी

पण ताली पीटबा से कै होवै थो

परदा के पीछै से औज्युं डायरेक्टर बोल्यो--

‘जी इब थे कड़क कर कहो--

रे रावण की बहन सूरपणखां

दूर हो जा

वरना तेरी नाक काट लूंगो’

पण म्हारे में किसी कड़क धरी थी

किसा डायलाग याद रहवै था

मैं सगला डायलाग भूल कर कही--

‘रे कल्लू की मां!

मैं तेरो इकलौतो खसम लागूं हूं

आज तू मेरी लाज राख लै

म्हारे से नाक कटा लै

घर जाकै चाहे म्हारी

गरदन ही काट लीए’

पण म्हारी घरवाली के तो

चंडी चढ़ रही थी

वा म्हारी नाक काट कै

लहूलुहान कर दी

और लोग ताली पीटी

लोगों ने तो नाक कटना से मतलब थो

चाहे लछमण की कटो

चाहे सूरपणखां की

सो भाई मैं तो नाक कटाकै

घरां नै आयो

और या सोची

ईं देस में भी याही हो रिहो है

आज जें की नाक कटनी चाहे

बें की कटे कोनी

जें की रहनी चाहे

बें की रहवे कोनी

आज भी सूरपणखां लछमण की नाक काटै है

तो या जनता तालियां बजावै है

तालियां बजाती हुई जनता

या भूल जावै है कि

नाक उं की भी कटी हुई है

इज्जत उं की भी गई हुई है।

आत्मा उं की भी बिकी हुई है।

तुम्हारा परिवार तो दुखी होगा। उनकी नाक कटी है, वे तुम्हारी भी कटवाने के लिए उत्सुक हैं। तुम अपनी बचाओ। जब तक बचा सको, बचाओ।

प्रेम प्रदीप, मेरा आशीर्वाद है, ईश्वर करे तुम्हारी नाक बचे! न माने, तो कोई न कोई सूर्पणखा नाक काटेगी। लेकिन नाक कटवाने की ही किसी दिन इच्छा जग जाए--जगती हैं, इच्छाओं का क्या है! एक से एक इच्छाएं जगती हैं--तो कटवा लेना भैया! इतनों ने कटवाई, सो कुछ सोच कर ही कटवाई होगी। कटवा कर कुछ पाया ही होगा।

मेरे पास लोग पूछने आ जाते थे, जब मैं विश्वविद्यालय में शिक्षक था, युवक आ जाते कि हम विवाह करें या न करें? मैं उनसे कहता, जरूर करो। वे कहते, और आपने क्यों नहीं किया? मैंने उनसे कहा, मैं किसी से पूछने नहीं गया। जब तुम पूछने आए हो, मामला साफ है। पूछने की बात क्या है? जिसको नहीं करना, वह पूछने नहीं जाएगा।

तुम्हें सच में ही अगर बचना है तो कुछ हर्ज नहीं है बचने में, तुम्हें अधिकार है अपने को बचाने का--व्यर्थ की झंझटों में जाने से। स्त्रियों को भी अधिकार है, पुरुषों को भी अधिकार है। सच तो यह है, दुनिया से अगर विवाह की संस्था विदा हो जाए तो मनुष्य-जाति के जीवन में एक नये सौभाग्य का उदय हो। नहीं कि स्त्री-पुरुष प्रेम न करेंगे, लेकिन प्रेम फिर बंधन नहीं होगा। प्रेम करेंगे, लेकिन प्रेम फिर मैत्री होगी, इससे ज्यादा नहीं।

मेरी मनुष्य-जाति की कल्पना में विवाह के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। बच्चों का इंतजाम, बच्चों की व्यवस्था कम्यून को करनी चाहिए, समूह को करनी चाहिए। और समूह जितने बच्चे चाहे उतने ही बच्चे पैदा भी होने चाहिए; उससे ज्यादा बच्चे पैदा करने का हक भी किसी को नहीं है। क्योंकि समूह को ही फिक्र करनी है, समूह ही बच्चों की फिक्र लेगा। और समूह को ही तय करना चाहिए कि कैसे लोग बच्चे पैदा करें। हर कोई बच्चे पैदा करने का अधिकारी नहीं होना चाहिए। लूले-लंगड़े, अंधे-काने, बुद्धिहीन, अपंग, कुरूप, न मालूम किस-किस तरह के लोग--पागल, विक्षिप्त--वे भी सब बच्चे पैदा किए जा रहे हैं! वे पृथ्वी को गंदगी से भरे जा रहे हैं।

इससे ज्यादा समझदारी तो हम गाय-बैलों के संबंध में व्यवहार करते हैं, कुत्तों के संबंध में व्यवहार करते हैं। आखिर कुत्तों की जाति रोज-रोज श्रेष्ठ होती जाती है, क्योंकि गलत कुत्तों को बच्चे पैदा करने का हक नहीं मिलता। मैं भारतीय कुत्तों की बात नहीं कर रहा हूं। भारत के बाहर। भारत में तो सब कुत्ते आवारा हैं। उनका तो कोई हिसाब-किताब...यहां आदमी का हिसाब-किताब नहीं है, कुत्तों की कौन फिक्र करे! यहां तो आदमी भी बस कीड़े-मकोड़ों की तरह बच्चे पैदा करने में लगे हुए हैं। और जैसे कोई कला ही नहीं आती, एक ही सृजनात्मक काम जानते हैं। और छाती फुला कर चलते हैं; जितने ज्यादा बच्चे, उतनी छाती फुला कर चलते हैं।

चंदूलाल अपने बीस बच्चों को लेकर सर्कस में पहुंचे थे। सर्कस में जगह-जगह कई तरह की चीजें थीं। आस्ट्रेलिया से अदभुत-अदभुत जानवर आए हुए थे, अफ्रीका के जानवर थे। एक अनूठा गेंडा आया हुआ था, जिसकी जाति अब करीब-करीब खो गई है। उस गेंडे के कठघरे के बाहर परदा टंगा हुआ था और एक आदमी चिल्ला रहा था: एक आने में, अदभुत गेंडे के दर्शन!

लाइन लगी थी उस गेंडे को देखने के लिए। चंदूलाल के बच्चे भी उत्सुक थे, चंदूलाल भी खड़े हुए लाइन में बीस बच्चों को लेकर। सबको सम्हाल रहे थे। घसर-पसर, कोई यहां भाग रहा था, कोई वहां भाग रहा था। इसको पीट रहे थे, उसको ठीक कर रहे थे। आखिर उस गेंडे के मालिक से न रहा गया, उसने पूछा कि क्या ये बीस ही आपके हैं? चंदूलाल ने कहा, हां! मेरे नहीं तो क्या तेरे बाप के हैं? किसके हैं? अरे मेरे हैं! तो उसने कहा कि फिक्र न करो टिकिट लेने की तुम, मैं गेंडे को बाहर लाता हूं। अरे वह देख तो ले कि जिंदगी हो गई, एक ही बच्चा पैदा कर पाया, और जाति मरी जा रही है और इधर देखो! वह ले आया गेंडे को बाहर कि देख, इसको कहते हैं जीवन! एक आदमी ने बीस की कतार लगा दी। और तुझसे कुछ नहीं हो पाया, एक ही पैदा हुआ। और तेरी जाति मरी जा रही है। और इनकी जाति मरी जा रही है भीड़ से और फिर भी ये बीस! अगर भीड़ से न मर रही होती तो ये पता नहीं दो सौ पैदा करते या कितने पैदा करते, कुछ पता नहीं।

समूह को तय करना चाहिए कि कितने बच्चे हों, कौन बच्चा पैदा करने का अधिकारी हो। हरेक को अधिकार नहीं होना चाहिए। तो मनुष्य की जाति में भी बुद्धों, महावीरों, कृष्णों, आइंस्टीन, न्यूटन, एडीसन जैसे व्यक्तित्व बड़ी संख्या में पैदा हो सकते हैं।

मगर मां-बाप की तो एक जिद होती है। उन्होंने जो किया, वही तुमसे करवाएंगे। उन्होंने विवाह किया तो तुमसे भी करवाएंगे। उनकी आकांक्षाएं हैं बड़ी। तुम्हारी माताराम की इच्छा होगी कि नाती-पोते देखें। अरे मुहल्ले-पड़ोस में जाकर देख लो! क्यों इस बेचारे को फंसा रही हो? नाती-पोते ही देखने हैं तो किसी के भी देख लो। नहीं लेकिन इसके ही नाती-पोते देखने हैं उनको। जैसे इसके नाती-पोतों में कुछ खास सोना-चांदी लगा होगा। मां-बाप की आकांक्षाएं खुद की अधूरी रह जाती हैं, वे बच्चों के कंधों पर रख कर बंदूक चलाते हैं। वे फिक्र करते हैं: यह बन जाओ, वह बन जाओ।

अब प्रदीप, तुम बन गए संन्यासी, वे घबड़ा रहे होंगे कि यह तो सारी आकांक्षाएं तोड़े दे रहा है।

एक आदमी एक सूटकेस लेकर एक सर्कस के मैनेजर के कमरे में गया और उसने कहा कि क्या आप अनूठी चीजों में उत्सुक हैं?

मैनेजर ने कहा कि निश्चित, हमारा काम ही अनूठी चीजों का है। क्या अनूठी चीज है?

उसने कहा, मेरे पास एक कुत्ता है, जो पिआनो बजाता है।

उस मैनेजर की तो आंखें फटी रह गईं। उसने कहा, कुत्ता कहां है?

उसने सूटकेस खोला, एक छोटा-सा कुत्ता उसमें से निकला और एक छोटा-सा पिआनो उसने निकाला सूटकेस में से। पिआनो रख दिया और वह कुत्ता बैठ कर पिआनो बजाने लगा। क्या गजब का साज उसने छेड़ा! मैनेजर तो भौंचक्का रह गया, सांस रुकी की रुकी रह गई। बहुत खेल देखे थे दुनिया में उसने। काम ही उसका यह था, इसी तरह की चीजों पर उसका सर्कस चलता था। और तभी एक बड़ा कुत्ता अंदर आया और उस छोटे कुत्ते की गर्दन उसने पकड़ी और बाहर ले गया। मैनेजर तो देखता ही रह गया, वह आदमी भी देखता रह गया। मैनेजर ने कहा, भई, यह मामला क्या है? यह कौन कुत्ता है? उसने कहा, यह इसकी मां है। वह इसको डाक्टर बनाना चाहती है।

मां-बाप की अपनी इच्छाएं हैं। वे तुम्हें पति बनाना चाहते होंगे, पिता बनाना चाहते होंगे, डाक्टर बनाना चाहते होंगे, इंजीनियर बनाना चाहते होंगे। और तुमने सब पर पानी फेर दिया। तुम हो गए संन्यासी। और स्वभावतः जब वे लाते होंगे किसी को दिखाने अपने बेटे को और तुम करते होओगे सक्रिय ध्यान, तो उनकी छाती पर सांप लोटता होगा।

हारो मत! अगर वे नहीं हार रहे हैं तो तुम क्यों हारो! अरे उनके ही बेटे हो! अगर खानदानी हो तो टिके रहो, वे भी टिके हैं। जब वे भी लाए जा रहे हैं लड़कियों के मां-बाप को, दिखाने, तो तुम भी टिके रहो। कोई भय की आवश्यकता नहीं है। दिल खोल कर सक्रिय ध्यान करो, कुंडलिनी करो, जो तुम्हारी मौज आए करो। जब तक तुम्हारे मन में भाव न हो...हां, तुम्हारे मन में भाव हो तो मैं नहीं रोकता। किसी और की इच्छा से स्वतंत्रता भी मिले तो बंधन है। अपनी इच्छा से कोई बंधन में भी जाए तो स्वतंत्रता है। असली सवाल स्वेच्छा का है।

चौथा प्रश्न:

भगवान, राजनीति की मूल कला क्या है?

अशोक,

राजनीति कोई कला थोड़े ही है, लूट-खसोट है। इसमें कला वगैरह क्या है? कोई डकैती की कला होती है? राजनीति डकैती है। दिन-दहाड़े! जिनको लूटो, वे भी समझते हैं कि उनकी सेवा की जा रही है! यह बड़ी अदभुत डकैती है। डाकू भी इससे मात खा गए। डाकू भी पिछड़ गए। सब तिथि-बाह्य हो गए--आउट ऑफ डेट। इसलिए तो बेचारे डाकू समर्पण करने लगे कि क्या सार है! चुनाव लड़ेंगे, उसमें ज्यादा सार है।

तो राजनीतिज्ञों के सामने डाकू समर्पण कर रहे हैं। क्योंकि देख लिया डाकुओं ने, इतनी तो समझ उनमें भी है, कि मारे-मारे फिरो जंगल-जंगल और हाथ क्या खाक लगता है कुछ! और हमेशा जीवन खतरे में। इससे तो राजनीति बेहतर। यह डकैती की आधुनिक व्यवस्था है, प्रक्रिया है।

एक मिनिस्टर--

जनसंपर्क दौरे पर बाहर निकले।

मंजिल पर पहुंचने से पहले

डाकुओं द्वारा पकड़े गए

रस्सियों से जकड़े गए

कार से उतार कर पेश किए गए

सामने सरकार के

बुरी तरह हांफ रहे थे

मारे डर के कांप रहे थे

तभी बोल उठा सरदार--

‘डरो मत यार

हम तुम एक हैं

दोनों के इरादे नेक हैं

दोनों को जनता ने बनाया है

मुझे नोट देकर,

तुम्हें वोट देकर।

तुम्हारे हाथ सत्ता

हमारे हाथ बंदूक

दोनों के निशाने अचूक।

हम बच रहे हैं अड्डे बदल कर

और तुम दल बदल कर

दोनों ही एक-दूसरे के प्रचंड फ्रेंड

जनता को लूटने में दोनों ट्रेंड।

या यों कह लो सगे भैया,

रास्ते अलग-अलग

लक्ष्य दोनों का रुपैया।

दोनों के साथ पुलिस है

हमारे पीछे, तुम्हारे आगे।

यहां आए हो तो एक काम कर जाओ

अपनों के बीच आराम कर जाओ।

बैंक लूटने के उपलक्ष्य में, हमारे पक्ष में

आज की रात ठीक आठ बजे

तुम्हारा भाषण है

और तुम्हारे ही हाथों

नये अड्डे का

कल उदघाटन है।’

राजनीति की कला क्या है? कोई कला नहीं है। सीधी-साफ डकैती है। शुद्ध डकैती है। डाकुओं के दल हैं। और उन्होंने बड़ा जाल रच लिया है। एक डाकुओं का दल हार जाता है, दूसरों का जीत जाता है; दूसरों का हार जाता है, पहलों का जीत जाता है। और जनता एक डाकुओं के दल से दूसरे डाकुओं के दल के हाथ में डोलती रहती है। यहां भी लुटोगे, वहां भी लुटोगे। यहां भी पिटोगे, वहां भी पिटोगे। होश पता नहीं तुम्हें कब आए!

जिस दिन तुम्हें होश आएगा, उस दिन राजनीति दुनिया से उठ जाएगी; उस दिन राजनीति पर कफन ओढ़ा दिया जाएगा; राजनीति की कब्र बन जाएगी। राजनीति की कोई भी आवश्यकता नहीं है।

क्या सुंदर शब्द गढ़ा है लोगों ने--राजनीति! जिसमें नीति बिलकुल भी नहीं है, उसको कहते हैं राजनीति। सिर्फ चालबाजी है, धोखाधड़ी है, बेईमानी है।

रावण द्वारा सीता-अपहरण के बाद

राम ने अपने भक्त हनुमान को बुलाया

और भरे हृदय से यह बताया--

‘दुनिया कुछ भी कहे,

तू मेरा दास है

पर मुझे अपने से भी ज्यादा

तुझ पर विश्वास है।

जाओ, जल्दी से जाओ,

सीता को खोज कर लाओ

यह मेरी निशानी देकर

उसे तसल्ली दे आओ।’

हनुमान ने रामचंद्रजी के पैर छुए

सीता की खोज में रवाना हुए

रावण के दरबार में पहुंचे

उसे देख कर

गुस्से में जबड़े भींचे।

कहा--‘दुष्ट, सीता को लौटा दे!

क्यों मरने को तैयार हो रहा है?’

पर कलियुग का रावण होशियार था

उसने बड़े प्यार से हनुमान जी को गले लगाया

और समझाया--

‘देख यार,

तू जंगल में पड़ा-पड़ा

क्यों अपनी जवानी बरबाद कर रहा है?

भूख से तेरा पेट कितना सिकुड़ रहा है!

मैं चाहूं तुझे लखपति बना दूं

मेरे मंत्रिमंडल में एक जगह खाली है

तू कहे तो तुझे मंत्री बना दूं।’

सुनते ही

पत्थर से भी ठोस हनुमान जी

ढीले पड़ गए

वे राम के तो पैर छूते थे,

पर रावण के पैरों में पड़ गए।

बोले--

‘माई-बाप!

सीता का तो केवल बहाना था,

मुझे तो वैसे ही आपके पास आना था

अरे! मैं आपके इस अहसान की कीमत

कैसे चुकाऊं?

आप मेरी पूंछ में आग लगवा दें

तो उस राम की अयोध्या फूंक आऊं

मैं उसकी किस्मत कभी भी फोड़ सकता हूं

आपके मंत्रिमंडल में

एक जगह और भी खाली हो

तो लक्ष्मण को भी तोड़ सकता हूं

इस गद्दी के लिए एक सीता तो क्या

हजार सीताएं आपके पास

छोड़ सकता हूं।

आप भी बेवकूफ हैं,

कहीं कलियुग में

सीता चुराते हैं!

अरे,

पद के लिए तो आज के राम

अपने आप

आपके पास चले आएंगे

और अपनी सीता

खुद आपके पास छोड़ जाएंगे।’

राजनीति कोई कला नहीं है। कला तो उसे कहते हैं जिससे सृजन हो। राजनीति तो विध्वंस है, शोषण है, हिंसा है। हालांकि नकाब ओढ़ने पड़ते हैं, मुखौटे ओढ़ने पड़ते हैं, अपने को छिपा-छिपा कर चलना पड़ता है। राजनैतिक नेता के पास जितने चेहरे होते हैं उतने किसी के पास नहीं होते। उसको खुद ही पता नहीं होता कि उसका असली चेहरा कौन सा है। मुखौटे ही बदलता रहता है। और दुनिया तब तक धोखे में आती रहेगी, जब तक प्रत्येक व्यक्ति थोड़ा सा जागरूक नहीं होता; थोड़ा होशपूर्वक देखता नहीं कि यह सब क्या जाल है!

देशों की जरूरत है? लेकिन देशों की बात छोड़ो, राजनेता चाहता है, प्रदेश होने चाहिए। प्रदेश ही नहीं होने चाहिए, राजनेता की कोशिश होती है कि हर जिला प्रदेश बन जाना चाहिए। तोड़े जाओ! दुनिया को जितना तोड़ो, उतने प्रधानमंत्री होंगे, उतने राष्ट्रपति होंगे। दुनिया को जोड़ो तो प्रधानमंत्री कहां होंगे? राष्ट्रपति कहां होंगे? राजनीति जुड़ने नहीं देना चाहती आदमी को और तुम्हारे तथाकथित धर्म भी नहीं जुड़ने देना चाहते; दोनों राजनीति के ही दो पहलू हैं।

जो चीज तोड़ती है, वह पाप है। जो चीज जोड़ती है, वह पुण्य है। और पुण्य की कला होती है; पाप की कोई कला होती है? किसी को मारना हो, इसमें कुछ बड़ी कला की जरूरत है? किसी को जिलाना हो तो कला की जरूरत होती है।

धर्म कला है--असली धर्म; राजनीति नहीं।

आखिरी सवाल:

भगवान, मैं एक कवि हूं, पर कोई मेरी कविताएं पसंद नहीं करता है--न परिवार वाले, न मित्र, न परिचित। कविताएं मेरी प्रकाशित भी नहीं होती हैं। लेकिन मैं तो अपना जीवन कविता को ही समर्पित कर चुका हूं। अब आपकी शरण आया हूं। आपका क्या आदेश है?

गिरीश,

जीवन को इतनी जल्दी समर्पित करने की क्या जरूरत है? तुम्हें पक्का है कि काव्य तुम्हारे जीवन की अभिव्यक्ति है? कौन जाने, लोग ही ठीक कहते हों!

सौ में निन्यानबे कवि तो कवि होते ही नहीं, तुकबंद ही होते हैं। और तुकबंदों से लोग बहुत परेशान हैं, बहुत पीड़ित हैं। गांव-गांव कवि हैं, मुहल्ले-मुहल्ले कवि हैं। कविता करना लोगों को सरल मालूम पड़ता है। और फिर अतुकांत कविता तो और भी सरल हो गई--न तुक की कोई जरूरत है, न छंद की कोई जरूरत है। जो दिल में आए सो लिखो। उलटा-सीधा कुछ भी लकीरें जोड़ते चले जाओ। अखबार में से काट लो लकीरें समाचारों की और उनको चिपका लो एक कागज पर--और आधुनिक कविता हो गई, अकविता!

कविता करनी लोगों को आसान लगती है। आसान नहीं है कविता। कविता अत्यंत कठिन बात है। जब तक जीवन तुम्हारा काव्य न हो, तब तक तुम्हारे जीवन से कविता का प्रवाह हो ही नहीं सकता। सिर्फ बुद्धों के जीवन से ही कविता प्रवाहित होती है, बाकी तो सब तुकबंद हैं।

तो मैं तुमसे नहीं कहूंगा कि कविता के लिए जीवन समर्पित कर दो। यह कविता कोई अभिनेत्री थोड़े ही है कि इसके लिए जीवन समर्पित कर दो। पहले जीवन में काव्य को तो आने दो, रस तो आने दो। रसो वै सः! जब परमात्मा का रस तुम्हारे भीतर अनुभव होने लगेगा, अगर वह बहना चाहेगा कविता में तो बहेगा, अगर नृत्य में प्रकट होना चाहेगा तो नृत्य में प्रकट होगा। तुम जिद न करो। तुम्हारी जिद गलत है। तुम्हारी जिद तो अहंकार ही है।

अब तुम कहते हो कि मैं कवि हूं और कविताएं करना पसंद करता हूं।

तुम पसंद करते हो तो करते रहो, मगर दूसरों को न सताओ। अगर वे सुनना पसंद नहीं करते तो कम से कम उनकी आजादी तो न छीनो।

तुम कहते हो: न परिवार वाले, न मित्र, न परिचित, कोई मेरी कविता पसंद नहीं करता।

तो उन पर कृपा करो। इतनी अहिंसा तो होनी ही चाहिए। उनको मत सताओ। उनको क्षमा करो। अपनी कविता अपने भीतर रखो। एकांत में गुनगुना लिए, खुद ही सुन लिए।

और मेरी अगर मानो तो मैं तुमसे कहूंगा कि अभी कविता का क्षण नहीं आया। पहले जागो, पहले ध्यान में डूबो। अगर यहां आ गए हो तो तुकबंदी वगैरह छोड़ दो, कुछ दिन के लिए बिलकुल छोड़ दो। कुछ दिन के लिए मस्ती! मस्ती तुम्हारे भीतर होगी, फिर परमात्मा जो करवाना चाहे करे; जैसा नाच नचाए नाचना। मगर जिद मत करना कि मैं तो ऐसे ही नाचूंगा! कि तू कुछ भी कह, मैं तो ऐसे ही नाचूंगा! कि मुझे तो कविता ही करनी है!

कौन जाने कविता में तुम्हारे जीवन का प्रस्फुटन होगा या नहीं होगा। यह तो केवल ध्यान की अंतिम अवस्था में ही अनुभव होना शुरू होता है, कि मेरी अंतर्क्षमता क्या है। उसके पहले तो आदमी सब गड़बड़ होते हैं। जिसको डाक्टर होना चाहिए, वह इंजीनियर है। जिसको इंजीनियर होना चाहिए, वह डाक्टर है। जिसको दुकानदार होना चाहिए, वह कविता कर रहा है। जिसको कविता करनी चाहिए, वह दुकानदारी कर रहा है। सब अस्तव्यस्त है। यहां आदमी, हर आदमी गलत जगह पर है।

इसीलिए तो इतना दुख है, इतनी पीड़ा है। कोई कहीं तृप्त नहीं मालूम होता। कोई कहीं राजी नहीं मालूम होता। क्योंकि किसी को पता नहीं कि मेरी नियति क्या है, मेरा भाग्य क्या है, मैं क्या बनने को पैदा हुआ हूं--जुही, कि बेला, कि गुलाब, कि कमल। जुही बेला बनने की कोशिश कर रही है। बेला जुही बनने की कोशिश कर रहा है। गुलाब कमल होने की चेष्टा में लगा है। कमल कुछ और होने की चेष्टा में लगा है। सब कुछ और होने में लगे हैं। इसलिए कोई कुछ भी नहीं हो पा रहा है। सब तरफ उदासी है।

नहीं, इतनी जल्दी समर्पण न करो।

मैंने सुना है, एक कवि--रहा होगा तुम्हारे जैसा ही गिरीश--घर से भाग गया। घरवाले उससे परेशान थे, वह घरवालों से परेशान था। सो घरवालों ने इस तरह के विज्ञापन दिए।

गुमशुदा कवि के लिए पिता का विज्ञापन--

मेरा पुत्र छदम्मी लाल

वल्द मौसम्मी लाल

उपनाम नायब है

पिछले तीन महीनों से गायब है

जहां कहीं भी श्रोताओं का जमघट जुटता है

कम से कम बीस कविताएं सुना कर उठता है।

इसको कविता सुनाने की बीमारी

बहुत पुरानी है

बड़े-बड़े डाक्टरों को हैरानी है

इसकी बीमारी में अब तक कई सौ रुपये फुंके हैं

दो बार आगरा और बरेली भी भेज चुके हैं

रांची भेजने का खर्च कहां से लाएं

देश में पर्याप्त पागलखाने कहां हैं

पागलखाने कम हैं, पागल ज्यादा हैं

इसलिए लोग कविता करने पर आमादा हैं

जिन साहब को भी यह गुमशुदा कवि मिले

इससे सावधान रहें!

भूल कर भी कविता सुनाने को न कहें

पहले आपको किसी रेस्ट्रां में चाय पिलवाएगा

फिर अपनी ढेर सारी कविताएं सुनाएगा

रिश्तेदारों से प्रार्थना है--

इसको कोई गिफ्ट न दें

इसकी चाय तो पी सकते हैं

कविता सुनाने की लिफ्ट न दें

थोड़े लिखे को ही बहुत समझ लें आप

निवेदक--

एक कवि का अभागा बाप।

और उसी कवि की खोज में या बचाव में अपने उसके भाई का विज्ञापन--

प्रिय भैया कवि,

तुम जहां कहीं भी हो

वहीं रहना

जो भी कष्ट पड़े, अकेले सहना

तुम्हारे जाने का किसी को दुख होगा

यह सिर्फ मन की भ्रांति है

जब से तुम गए हो

घर में पूर्ण शांति है

तुम्हारी बीमार माता अब सुखी जीवन जी रही है

तुम्हारी पत्नी दोनों वक्त बौर्नविटा पी रही है

तुम्हारे तीनों साले घर पर ही डंड पेल रहे हैं

चारों बच्चे गली में गिल्ली-डंडा खेल रहे हैं

उधार वाले दुकानदार जरूर घबरा गए हैं

कई बार घर के चक्कर भी लगा गए हैं

इसलिए प्रिय भैया कवि!

तुम जहां कहीं भी हो, वहीं रहना

जो भी कष्ट पड़े, अकेले सहना

तुम्हारे जाने से फालतू कविता-प्रेमी

अवश्य दुखी हो गए हैं

पर मुहल्ले के सभी लोग सुखी हो गए हैं

नोट--

जो कोई भी इस गुमशुदा का पता हमें देगा

हमारे साथ दुश्मनी करेगा

जो इसे मना कर

घर ले आएगा

वो पुरस्कार नहीं दंड पाएगा।

और इसी गुमशुदा कवि के नाम पत्नी का विज्ञापन--

हे मेरे बारह बच्चों के बाप,

तुम्हें लग जाए शीतला मइया का शाप

पता नहीं आदमी हो या कसाई

तुम्हें इस तरह जाते शर्म नहीं आई

जाना ही था तो आधे बच्चे अपने साथ ले जाते

आधे दर्जन मुझे दे जाते

पूरी प्लाटून मेरे लिए ही छोड़ गए हो

एक इंजन से बारह डिब्बे जोड़ गए हो

जब इनसे बहुत तंग हो जाती हूं

एक ही बात कह कर डराती हूं:

‘नहीं मानोगे तो

तुम्हारे बाप को वापस बुलवा दूंगी

उनकी ढेर सारी कविताएं सुनवा दूंगी!’

बच्चे सहम कर चुप होने लगते हैं

कुछ तो डर कर रोने लगते हैं

इसलिए--

अगर तुम्हारी आंखों की

पूरी शर्म न बह गई हो

थोड़ी-सी भी बाकी रह गई हो

तो कभी घर लौट कर मत आना

ज्यादा तुम्हें क्या समझाना

चाहे जहां नाचो

चाहे जहां गाते रहना

मनीआर्डर हर महीने

घर पर भिजवाते रहना

तुम्हारे प्राणों की प्यासी--

श्रीमती सत्यानाशी!

गिरीश, तुम तो यहां आ गए। कहते हो: ‘अब आपकी शरण आया हूं, अब क्या आदेश है?’

भैया, घर मत जाना। और यहां कविता करना मत। यहां ध्यान करो। हां, ध्यान के बाद भी तुम्हारे जीवन में सहज-स्फूर्त कविता बहे तो समर्पित कर दो सारा जीवन। फिर कोई संकोच नहीं करना। फिर सब दांव पर लगा देना। मगर अभी समर्पण की बात व्यर्थ है। अभी तुम्हें पता ही नहीं तुम कौन हो, किसलिए हो, कहां से आए हो, क्या तुम्हारी नियति, क्या तुम्हारा प्रयोजन है! अभी तुम्हें कुछ भी पता नहीं। अभी पूछो: मैं कौन हूं? अभी सारा समर्पण ध्यान के लिए। पहले समाधि, फिर शेष सब अपने से हो जाता है। और फिर जो होता है, शुभ है।

अभी तुम जो भी करोगे, अशुभ होगा। कविता भी व्यर्थ होगी अभी। क्या करोगे कविता में? भीतर रोशनी न होगी तो अपने अंधेरे को ही ढालोगे। और भीतर गीत न उठेंगे तो तुम्हारी कविता में गालियां ही होंगी। भीतर ही तो बाहर बह कर आता है।

इसलिए मेरी अगर बात मानो, आ ही गए हो, तो इस खयाल में मत रहना कि यहां कविता सुनने वाले तुम्हें मिल जाएंगे। इस खयाल में मत रहना कि मैं हर तरह की बेवकूफियों को सहयोग देता हूं। पहले ध्यान, फिर शेष सब ठीक है। फिर मेरा प्रत्येक कृत्य के लिए आशीष है।

आज इतना ही।

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