Osho · Hindi discourse
Nahin Sanjh Nahin Bhor 5/10
Talk 5 of 10 in Nahin Sanjh Nahin Bhor (नहीं सांझ नहीं भोर), a series of Osho's Hindi discourses (pravachan). Listen free, and read the full transcript below.
Nahin Sanjh Nahin Bhor (नहीं सांझ नहीं भोर): all 10 talks · Previous: Nahin Sanjh Nahin Bhor 4/10 · Next: Nahin Sanjh Nahin Bhor 6/10
Topics in this talk
- Osho on Awareness (होश): mentioned 32 times
- Osho on Consciousness (चेतना): mentioned 18 times
- Osho on Silence (मौन): mentioned 11 times
- Osho on God (परमात्मा): mentioned 40 times
- Osho on Bliss (आनंद): mentioned 11 times
Transcript
जागै न पिछले पहर, ताके मुखड़े धूल।
सुमिरै न करतार कूं, सभी गवावै मूल।।
पिछले पहरे जागि करि, भजन करै चित लाय।
चरनदास वा जीव की, निस्चै गति ह्वै जाय।।
पहिले पहरे सब जगैं, दूजे भोगी मान।
तीजे पहरे चोर ही, चौथे जोगी जान।।
जो कोई विरही नाम के, तिनकूं कैसी नींद।
सस्तर लागा नेह का, गया हिये कूं बींध।।
सोये हैं संसार सूं, जागे हरि की ओर।
तिनकूं इकरस ही सदा, नहीं सांझ नहीं भोर।।
सोवन जागन भेद की, कोइक जानत बात।
साधूजन जागत तहां, जहां सबन की रात।।
जो जागै हरि-भक्ति में, सोई उतरै पार।
जो जागै संसार में, भव-सागर में ख्वार।।
सतगुरु से मांगूं यही, मोहि गरीबी देहु।
दूर बड़प्पन कीजिये, नान्हा ही कर लेहु।।
आदि पुरुष किरपा करौ, सब औगुन छुटि जाहिं।
साध होन लच्छन मिलैं, चरनकमल की छाहिं।।
हिय हुलसो आनंद भयो, रोम-रोम भयो चैन।
भये पवित्तर कान ये, मुनि सुनि तुम्हरे बैन।।
सुबह न आई शाम न आई, जिस दिन तेरी याद न आई!
जिस दिन तड़पे प्राण न उस दिन
देह लगी मिट्टी की ढेरी,
जिस दिन सिसकी सांस न उस दिन,
उम्र हो गई कुछ कम मेरी,
बरसी जिस दिन आंख न, उस दिन
गीत न बोले, अधर न डोले,
हंसी बिकाई, खुशी बिकाई, जिस दिन तेरी याद न आई!
सुबह न आई शाम न आई, जिस दिन तेरी याद न आई!!
धुंधलाया सूरज का दर्पण,
कजलाई चंदा की बेंदी
मूक हुई दुपहर की पायल,
रूठ गई संध्या की मेहंदी,
दिवस रात सब लगे पराए,
लुटे-लुटाए स्वप्न-सितारे,
छटा न छाई, घटा न छाई, जिस दिन तेरी याद न आई!
सुबह न आई, शाम न आई, जिस दिन तेरी याद न आई!!
फिरते रहे नयन बौराए,
कभी भवन में, कभी भुवन में,
रही सिसकती पीड़ा कोई,
इस क्षण मन में, उस क्षण तन में
जग-जग कर काजल अलसाया
चल-चल कर आंचल थक आया,
हाट न पाई, बाट न पाई, जिस दिन तेरी याद न आई!
सुबह न आई, शाम न आई, जिस दिन तेरी याद न आई!!
गुमसुम बैठी रही देहरी,
ठठका-ठिठका आंगन द्वारा
सेज लगी कांटों की साड़ी,
और अटारी कज्जल-कारा,
अगरु-गंध हिम लहर हो गई,
चंदन लेप ताप तक्षक का,
धूप न भाई, छांह न आई, जिस दिन तेरी याद न आई!
सुबह न आई, शाम न आई, जिस दिन तेरी याद न आई!!
भक्ति का सारा शास्त्र प्रभु-स्मरण का शास्त्र है। एक ही सूत्र है भक्ति का, वह है: प्रभु की याद।
हमारा मन और हजार बातों की याद से भरा है, सिर्फ प्रभु का कोई स्मरण नहीं है। हमारे मन में न मालूम कितनी चाहतें हैं, न मालूम कितनी वासनाएं हैं--अनगिनत। सिर्फ एक चाह अनुपस्थित है: सिर्फ प्रभु को पाने की अभीप्सा नहीं है।
और तुम सब भी पा लो, प्रभु न मिले, तो सब मिला न मिला हो जाएगा। सब कमाई गंवाई हो जाती है। और तुम प्रभु पा लो, और कुछ भी न मिले, तो भी सब पा लिया। उसके पाने में ही पाना है; उसके खोने में ही खोना है।
प्रभु की याद का क्या अर्थ? क्या राम-राम की रटन से याद हो जाएगी? तब तो तोते भी भवसागर पार हो गए होते! लेकिन तोतों को कोई भक्त नहीं कहता है।
ऐसी थोथी याद से कुछ भी न होगा। ऐसी थोथी याद में उलझ गया आदमी, तो और भी झंझट में पड़ जाता है। हृदय की गहराई में तो संसार की याद चलती है; ओंठों पर राम का नाम चलता है।
ओंठों में थोड़े ही तुम्हारी आत्मा है। ओंठों से दोहरा लेने से कुछ भी न होगा। वहां चलना होगा, जहां तुम्हारे प्राण हैं। उस गहराई से उठनी चाहिए सुरति, सुमिरन। उस गहराई से, जहां तुम कर्ता भी नहीं होते हो; जहां तुम साक्षी मात्र होते हो।
ऐसा नहीं कि तुम राम का स्मरण करते हो, बल्कि तुम देखते हो कि राम का स्मरण उठ रहा है। तुम अपने भीतर एक चमत्कार होते देखते हो।
लेकिन मैं यह नहीं कह रहा हूं कि ओंठ से पुकारा गया नाम किसी काम में नहीं आ सकता। ओंठ से पुकारा गया नाम उस अंतिम स्मरण के लिए सीढ़ी बन सकता है; पर सीढ़ी पर रुक मत जाना।
प्रभु के स्मरण को भक्तों ने चार हिस्सों में बांटा है। पहला कहते हैं: ओंठ से स्मरण। वह ऐसे ही है, जैसे छोटा बच्चा स्कूल में सीखता है--ग गणेश का, ग गणेश का, ग गणेश का। ग का गणेश से क्या लेना-देना है? एक बार समझ जाएगा, फिर जिंदगी में दुबारा ऐसा नहीं पढ़ेगा कि ग गणेश का। जहां भी ग आएगा, तो नहीं कहेगा ग गणेश का। वह केवल निमित्त मात्र था।
बच्चे को कठिन है ग को समझना। ग अपने आप में बच्चे के लिए बेबूझ है। गणेश के चित्र से ग जल्दी जुड़ जाता है।
बच्चा चित्र समझता है, शब्द नहीं समझता। शब्द समझाने के लिए चित्र से जोड़ देते हैं; जो बच्चा समझता है, उससे जोड़ देते हैं उसे, जो वह अभी नहीं समझता। इसलिए बच्चों की किताबों में रंगीन चित्र होते हैं।
‘आ’ आम का--यह आ तो छोटे में लिखा हो, लेकिन बड़ा आम का चित्र होता है। बच्चा चित्र को देख कर आम को जानता है। आम का स्वाद भी उसे मालूम है। आम उसने चखा है। यह आम शब्द उसके लिए बिलकुल व्यर्थ है। इसमें न कोई स्वाद है, न कोई गंध है, न कोई रंग है। न इसे हाथ में उठा सकता, न इसके साथ खेल सकता। यह बिलकुल कोरा है। तो आ आम का; ग गणेश का।
धीरे-धीरे बच्चे को याद बनने लगती है। गणेश के साथ ग जुड़ जाता है। बच्चे के लिए रास्ता मिल जाता है। लेकिन फिर यहीं अगर कोई रुक जाए और जिंदगी भर ग गणेश का और आ आम का पढ़ता रहे और ऐसी कभी घड़ी ही न आए, जब बिना चित्रों के समझ सकेतो भूल हो गई। तो सीढ़ी सीढ़ी न रही; मार्ग का अवरोध हो गई।
भक्ति के जगत में ऐसा बहुत लोगों के लिए हो गया। ओंठ से पुकारा गया नाम--ग गणेश का है। पहला पाठ, उनके लिए जिन्हें अभी भक्ति का कोई अनुभव नहीं है। लेकिन वहां से आगे जाना है। वह शुरुआत है जरूर, लेकिन अंत नहीं। फिर ओंठ से थोड़े गहरे जाना है--कंठ।
तो भक्त कहते हैं: दूसरी सीढ़ी; कंठ। ओंठ चुप हो जाएं; कंठ में गूंज उठे। भीतर रहे गूंज, बाहर न आए।
बाहर किसको दिखलाना है? प्रभु है, तो तुम्हारे भीतर जो है उसे देख लेगा। और प्रभु नहीं है, तो तुम कितना ही चिल्लाओ, लाख चिल्लाओ, बैंडबाजे बजाओ, उससे कुछ भी न होगा। और तुम्हारे भीतर है, तो ही सार्थक है।
तुम्हारे मौन को भी प्रभु सुन लेगा। सच तो यह है कि मौन को ही सुनेगा। तो धीरे-धीरे शब्द से मौन की तरफ जाना है। शब्द से शुरू करो, फिर निशब्द में डुबकी मारते जाओ।
पहले ओंठ, फिर कंठ। फिर कंठ से और नीचे चलो, तो हृदय। और हृदय से भी नीचे चलो, तो साक्षी।
जब चौथी जगह पहुंच जाए, साक्षी की जगह पहुंच जाए, जब तुम देखने लगो अपने भीतर राम का गुंजन उठते हुए, सुनने लगो; तुम करने वाले न रह जाओ, तब समझना कि याद हुई।
फिर वैसी याद सतत बनी रहती है--उठते-बैठते, सोते जागते, खाते-पीते; तुम कुछ भी करो, फिर वह याद नहीं जाती। और जब याद ऐसी सतत हो जाती है--अखंड, अविच्छिन्न, ऐसी गंगा की धारा जैसी तुम्हारे भीतर बहने लगती है, तभी पहुंचे; तभी जानना पहुंचे। उस घड़ी ही स्मरण शुरू हुआ।
आज के सूत्र बड़े अमूल्य हैं। भक्ति के मार्ग पर चलने वाले के लिए जो भी महत्वपूर्ण है, इन सूत्रों में आ गया है।
जागै न पिछले पहर, ताके मुखड़े धूल।
सुमरै न करतार कूं, सभी गवावै मूल।।
जागै न पिछले पहर,...
भक्तों ने रात को चार पहरों में बांटा है। पहला पहर: सभी जागे होते हैं। असल में पहले पहर में सोना मुश्किल है। रोज घर-घर में यह घटना घटती है। मां जबर्दस्ती कर रही है बच्चे को कि सो जा; अब नौ बज गए, अब सोने का समय हो गया। और बच्चा सोना नहीं चाहता।
पहले पहर में सोना मुश्किल। पहले पहर में जागना सुगम। क्योंकि दिन भर जागे हैं, तो जाग सब तरफ छा गई है। दिन भर सोचा है, विचारा है, काम किए हैं, उनकी धुन गूंजती रह गई है।
इसलिए पहले पहर में सोना मुश्किल। दिन भर की ध्वनियां, आवाजें, शोरगुल, मन को शांत नहीं होने देते; शिथिल नहीं होने देते।
जितना तुम्हारा जीवन कार्यकलाप से भरा होगा, उतना ही जल्दी सोना मुश्किल हो जाएगा। बिस्तर पर पड़े रहोगे और नींद न आएगी।
नींद कहां से आए? दिन पीछा नहीं छोड़ता। वह दिवस भर की धूल उड़ती ही चली जाती है। किसी से झगड़ लिए थे, वह झगड़ा अभी चल रहा है। किसी ने सम्मान किया था, वह गुदगुदी अभी भी बाकी है। कहीं झंझट में पड़ गए थे, वह झंझट पीछा नहीं छोड़ती।
दिन भर में बहुत से जाल फैलाए; दूसरों को फंसाने को फैलाए होंगे, अब उन जालों में खुद फंसे हो। दिन भर अभ्यास किया, अपने साथ जबर्दस्ती की; तनाव पाले; बेचैनियां इकट्ठी कीं; अब उस ढेरी पर बैठे हो; अब नींद नहीं आती।
तो जितने कार्यकलाप से भरा हुआ दिन होगा, उतनी ही मुश्किल हो जाएगी निद्रा--पहले पहर में।
जैसे-जैसे सभ्यता जटिल होती है, संस्कृति जटिल होती है, वैसे-वैसे लोगों की नींद खोने लगती है। पहले पहर में क्या, दूसरे पहर में भी नींद नहीं आती! रातें जगावन हो जाती हैं; निद्रा सपना हो जाती है।
करवटें बदलते हैं लोग बिस्तर पर; सोना चाहते हैं और नहीं सो सकते। खोना चाहते हैं थोड़ी देर को अंधकार में; लीन हो जाना चाहते हैं थोड़ी देर को अहंकार के बाहर; थोड़ी देर भूल जाना चाहते हैं संसार; लेकिन संसार इतना ज्यादा है... संसार के कारण नहीं, तुम्हारे ही कारण।
संसार ने तुम्हें नहीं पकड़ा है, तुमने ही संसार को पकड़ा है। लेकिन दिन भर अभ्यास करते हो पकड़ने का; एकदम से छोड़ोगे कैसे? दफ्तर घर आ जाता है। फाइलें सिर में चली आती हैं। खाते-बही साथ बैठे रहते हैं। तुम जो दिन भर करते हो, वही चलता रहता है--चलता जाता है। उसकी एक अनवरत धारा है।
जैसे भक्त को भगवान का नाम चलता भीतर, ऐसे तुम्हें संसार की याददाश्त चलती भीतर। जैसे तुम संसार की याददाश्त के मात्र साक्षी रह जाते हो; तुम्हारे किए कुछ नहीं होता; ऐसे ही भक्त परमात्मा की याददाश्त का साक्षी रह जाता है। अच्छा है, संसार से समझोगे तो तुम्हें समझ में आ जाएगी बात।
जैसे संसार भुलाए नहीं भूलता, ऐसे भक्त को भगवान भुलाए नहीं भूलता। और जैसे तुम्हें भगवान याद किए-किए नहीं आता, छुटक-छुटक जाता है; फिसल-फिसल जाते हो; वैसे भक्त को संसार याद किए-किए भी नहीं आता; छूट-छूट जाता है; भूल-भूल जाता है।
भक्त तुमसे बिलकुल विपरीत दशा में है।
यह जो रात्रि का पहला पहर है, इसमें सभी सामान्यतया जागते हैं। इसमें जागना विशिष्टता नहीं है। इसमें सो जाना विशिष्टता है। इसमें वही सो सकता है, जो निर्दोष है। इसमें वही सो सकता है, जिसकी संसार के ऊपर कोई बहुत आसक्ति, पकड़ नहीं; संसार का रोग जिसे नहीं है। इसमें भक्त ही सो सकता है। इसमें वही आदमी सो सकता है, जिसको मैं संन्यस्त कहता हूं।
संन्यस्त कभी भी सो सकता है और कभी भी जाग सकता है। जागने और सोने में संन्यस्त को कोई बाधा नहीं है। जब चाहा, जैसा चाहा, वैसा हो जाएगा। आंख बंद की, तो सो जाएगा; आंख खोली, तो उठ आएगा। न तो उठते वक्त कोई बाधा अनुभव होगी, न सोते वक्त कोई बाधा अनुभव होगी।
निर्बाध जिसका चित्त हो गया, वही पहले पहर में सो पाएगा। छोटे बच्चे सो जाते हैं; आदिवासी जंगल के सो जाते हैं; या साधु-संत सो जाते हैं। नहीं तो पहले पहर में सोना बहुत मुश्किल है।
फिर दूसरा पहर है। दूसरे पहर में भोगी जागता। दूसरे पहर में वासनाग्रस्त जागता। इसलिए जो संस्कृति बहुत भोगपूर्ण होती है, दूसरा पहर रात का राग-रंग का हो जाता है। जैसे पश्चिम में नाइट-क्लब हैं, नाच-गान है, होटल हैं, खाना-पीना है, पार्टी-उत्सव है। वह सब रात्रि के दूसरे पहर में। सांझ को जल्दी सो जाने की बात, आदिम मालूम पड़ती है। असली जीवन तो रात में ही शुरू होता है। तो दूसरे पहर में भोगी जागता है।
इस तरह हम और भीतर चलेंगे इसमें, तो समझ में आएगा कि क्या प्रयोजन है!
तीसरे पहर में चोर जागता है। चोर की तो तभी बनती है, जब सब सो गए हों। चोर के जागने का मतलब है कि जिनसे चुराना है, वे अब सो गए होंगे। दूसरे पहर में भोगी जागे होते हैं और उन्हीं के पास पैसा-लत्ता है; जो कुछ भी है, उन्हीं के पास है। पहले पहर में तो साधु सो सकते हैं। उनके पास कुछ है नहीं। चोर जाग कर भी क्या करे? साधु के पास कुछ है नहीं, चोर चुराएगा भी क्या! या साधु के पास जो है, उसमें चोर को उत्सुकता नहीं है।
एक झेन फकीर के घर एक चोर ने प्रवेश किया। फकीर अपना कंबल ओढ़ कर सोया था। यह देख कर कि चोर इतनी दूर से आया है... अंधेरी रात, अभी चांद उगने को ही है। इस फकीर की झोपड़ी खोजता हुआ, टटोलता हुआ जंगल में आ गया है।
फकीर बड़ा बेचैन होने लगा और घर में कुछ है नहीं। और जो है घर में, वह तो चोर चाहेगा नहीं। फकीर उंड़ेल सकता है अपनी समाधि; फकीर दे सकता है अपना अमृत; मगर उसके लिए तो चोर का पात्र तैयार नहीं है। और चोर उस लिए आया भी नहीं है। और बिन मांगे जो मिले, उसको हम समझ भी नहीं पाते।
अब यह बड़ा फकीर था, बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति था। मगर चोर को बुद्धत्व में तो रस ही नहीं। चोर बुद्धत्व का क्या करे? चोर के हाथ तो जेब तक जाते हैं, हृदय तक नहीं।
और घर में कुछ है नहीं; फकीर बेचैन होने लगा कि बेचारा, इतनी दूर आया! कुछ और उपाय न देख कर जब चोर जाने लगा, तो उसने कहा: रुक भाई! मुझे क्षमा कर। पहले खबर की होती तो मैं कुछ इंतजाम कर लेता। तू इतनी दूर आए और खाली हाथ जाए, हमें बड़ा दुख हो जाएगा। यह कंबल लेता जा; यही मेरे पास है।
फकीर नंगा था और कंबल था।
चोर बड़ा झिझका, बड़ा घबड़ाया। ऐसे तो किसी आदमी के घर में कभी चोरी करने गया भी नहीं था, जो अपने से दे दे। और देखा कि फकीर नंगा है और ठंडी रात है; चांद उगने लगा था, तो फकीर दिखाई पड़ने लगा था कि नंगा है। खिड़की से चांद झांक रहा था। लेकिन चोर इतना डर गया कि कुछ कह न सका; जल्दी से कंबल लेकर जाने लगा। बाहर दरवाजे के निकला था कि फकीर ने कहा: सुन, धन्यवाद तो दे दे! ऐसी जल्दी क्या? और कंबल तो थोड़े दिन काम आएगा, धन्यवाद बहुत दिन काम आएगा। धन्यवाद तो दे ही दे।
चोर ने घबड़ाहट में धन्यवाद भी दे दिया; भाग गया। वर्षों बाद पकड़ा गया। और चोरियां थीं उसके नाम पर, उसी में यह कंबल भी पकड़ा गया। यह कम्बल प्रसिद्ध कंबल था उस फकीर का। तो मजिस्ट्रेट पहचान गया। वह फकीर भी बुलाया गया।
मजिस्ट्रेट ने कहा: अगर तुम कह दो कि इस आदमी ने चोरी की तुम्हारे घर, तो हमें किसी और चोरी का प्रमाण खोजने की जरूरत नहीं रह जाएगी। यह काफी है। लेकिन फकीर बोला: नहीं, यह आदमी और चोर! यह आदमी चोर जरा भी नहीं है। मैंने कंबल भेंट किया था। इसने धन्यवाद दे दिया था, बात खत्म हो गई थी। चोरी? नहीं, इस आदमी ने चोरी जरा भी नहीं की।
चोर छूटा तो सीधा फकीर के घर पहुंचा। चरणों में गिर पड़ा और कहा: उस दिन तो चूक गया, क्योंकि मेरी कोई दृष्टि न थी, लेकिन तुम उस रात से मेरे पीछे लगे रहे हो। यह तुम्हारा कंबल क्या है! यह तुम्हारी याद दिलाता रहा। वह तुम्हारा शांत चेहरा; वह चांद की रोशनी में तुम्हारा नग्न खड़ा होना; वह तुम्हारा मुझे पुकारना और कंबल भेंट दे देना! और वह तुम्हारा कहना कि धन्यवाद दे जा। कंबल तो थोड़े बहुत दिन में खत्म हो जाएगा; धन्यवाद आगे तक काम आएगा। वह फिर मेरा पीछा करता रहा। वे तुम्हारी आंखें मैं भूल न सका। वह तुम्हारी आवाज, वह तुम्हारी करुणा मैं भूल न सका। आज सच में ही चोरी करने आया हूं। लेकिन आज वही, जो तुम्हारे पास है--दो। अब तुम्हारा होकर आया हूं।
फकीर के पास जाओगे, तो चुराने योग्य तो बहुत है। ईजिप्त में कहावत है कि जब तक शिष्य चुराने में कुशल न हो, गुरु से कुछ पा न सकेगा। महत्वपूर्ण कहावत है।
गुरु के पास बहुत कुछ है, लेकिन पहले तो उसे देखने की दृष्टि चाहिए, उसकी चाहत चाहिए। और फिर गुरु तुम्हें दे नहीं सकता। क्योंकि कुछ बातें ऐसी हैं जो दी नहीं जा सकतीं, सिर्फ ली जा सकती हैं। तुम चाहो तो ले लो, तुम न चाहो तो कोई तुम्हें दे नहीं सकता।
गुरु तो बहती गंगा है। तुम चाहो तो पी लो, तुम न चाहो तो किनारे पर खड़े प्यासे रह जाओ। और गंगा से तुम जब पीते हो, तब चोरी ही है। क्योंकि गंगा से आज्ञा भी कहां लेते हो? और आज्ञा लेने का उपाय भी कहां है? ऐसी ही चैतन्य की धारा है। लेकिन तुम्हें जब चाहत होगी तब...।
तो पहले पहर जो सो जाते हैं, उनके पास तो चोरों को चुराने को कुछ है नहीं। और दूसरे पहर जिनके पास है, वे तो जागे ही रहते हैं, पहले पहर, दूसरे पहर जागे ही रहते हैं। जब भोगी सो जाते हैं, तब चोर की घड़ी आती है। रात का तीसरा पहर चोर जागता है। और रात के चौथे पहर साधु जागता है, संन्यासी जागता है।
चौथा पहर सबसे कठिन पहर है जागने के लिए। पहला पहर सबसे सरल पहर है जागने के लिए। सभी जागते हैं। सिर्फ साधु ही सो सकते हैं।
चौथा पहर सबसे कठिन है, जागने के लिए, क्योंकि नींद सबसे गहरी होती है चौथे पहर में। सभी सोते हैं, सिर्फ साधु ही जाग सकता है।
अब इस बात को भी ठीक से समझ लो।
हमने चार अवस्थाएं बांटी हैं चेतना की। पहली अवस्था को कहते हैं: जाग्रत--तथाकथित जाग्रत; जिसमें हम जागे हुए हैं। तथाकथित इसलिए कि यह कोई असली जागरण नहीं है। बस, आंखें खुली हैं। जागे क्या खाक!
बुद्ध जागते हैं। फिर तो आंख भी बंद हो, तो भी जागे रहते हैं। और तुम तो आंख भी खुली हो, तो भी सोए ही हुए हो। लेकिन जागते से लगते हो--जागे-जागे लगते हो, इसलिए तथाकथित जागरण। पहली घड़ी; पहला भेद--चेतना का।
दूसरा: स्वप्न। जब तुम सोए हो, लेकिन एकदम सोए भी नहीं, सपने चल रहे हैं। तुम्हारा जागरण भी जागरण नहीं, तुम्हारा सोना भी सोना नहीं!
सांसारिक आदमी बड़ी उलझन है। जागते में सोया रहता है, सोते में जागता रहता है। सोने में भी पूरा नहीं होता; सपने चल रहे हैं!
और सपने क्या हैं? तुम्हारे दैनंदिन जीवन का ही प्रतिफलन हैं। वे ही आवाजें, वे ही रंग, वे ही ढंग, फिर-फिर नये रूप लेते हैं। मन उन्हीं-उन्हीं में बार-बार लौट जाता है। अब वस्तुएं नहीं हैं, तो विचार ही काफी है। संसार बंद हो गया है, क्योंकि आंख बंद है। तो तुम अपना ही संसार फैला लेते हो। चल-चित्र देखने जाने की जरूरत नहीं है। इतना तो देखते हो रोज तुम चल-चित्र! पर्दे पर मन के कितने चित्र देखते हो? तो दूसरी अवस्था है: स्वप्न।
तीसरी अवस्था है: सुषुप्ति। ऐसे सो गए कि स्वप्न भी न रहा। लेकिन स्वप्न के साथ ही साथ तुम भी चले गए; तुम भी न बचे। सुषुप्ति का अर्थ है: न स्वप्न रहा, न सोने वाला रहा। तुम्हें अपनी याद भी न रही।
तुम्हें अपनी थोड़ी-थोड़ी याद तभी रहती है, जब कुछ अड़चन होती रहे। बाहर कुछ अड़चन हो, तो तुम्हें थोड़ी याद रहती है। भीतर कुछ अड़चन हो, तो तुम्हें थोड़ी याद रहती है। अड़चन में ही तुम्हें याद रहती है। कांटा चुभता रहे, तो तुम्हें थोड़ी याद रहती है। कांटा बिलकुल न चुभे, तो तुम बिलकुल बेहोश हो जाते हो; फिर तुम्हें कुछ होश रहता ही नहीं।
संस्कृत में प्यारा शब्द है: ‘वेदना।’ वेदना के दो अर्थ होते हैं: दुख और बोध। वेदना उसी धातु से बना है, जिससे वेद; जिससे विद्वान, बोध, होश।
यह बड़े मजे का शब्द है--वेदना। और इसके दो अर्थ हैं, जिनमें कोई तालमेल नहीं दिखाई पड़ता। एक अर्थ है: दुख; और एक अर्थ है: जागरण। मगर तालमेल है। जिसने भी यह शब्द गढ़ा होगा, वह भाषाशास्त्री ही नहीं रहा होगा। उसने जीवन के शास्त्र को समझा होगा--कि तुम्हारा जो बोध है तथाकथित, तुम्हारा जो वेद है, वह तुम्हारे दुख पर निर्भर है। इधर दुख गया कि उधर बोध गया।
जागे रहते हो, तो बाहर का दुख है: यह हवाई जहाज जा रहा है, यह ट्रेन जा रही है, यह रास्ते पर शोरगुल हो रहा है, यह बच्चा चिल्ला रहा है; कोई रो रहा है; कोई झगड़ रहा है। यह सब उपद्रव चल रहा है। इस उपद्रव के कांटे चुभ रहे हैं, तो तुम्हें थोड़ी सी याद बनी रहती है, धीमी-धीमी, कि ‘मैं’ हूं। यह भी बहुत धीमी-धीमी, बहुत भीनी-भीनी। किसी काम आ जाए, ऐसी नहीं। बस, जरा सी एक झलक बनी रहती है, एक टिमटिमाती सी ज्योति बनी रहती है कि ‘मैं’ हूं। लेकिन इसमें होने के लिए सब उपद्रव चलता रहता है। तो इसकी चोट पड़े, तो तुम्हें याद रहती है।
रात सपने में भी तुम्हें याद रहती है। पहाड़ से फेंके जा रहे हो और एक चट्टान तुम्हारी छाती पर गिर रही है, तो तुम्हें याद रहती है। कोई बेचैनी बनी रहती है सपने में, तो याद रहती है।
सुषुप्ति का अर्थ है: न तो बाहर की कोई बेचैनी रही, न भीतर की कोई बेचैनी रही। लेकिन जैसे ही चैन आया, वैसे ही तुम गए। सुषुप्ति में तुम मूर्च्छित हो जाते हो। सुषुप्ति यानी मूर्च्छना!
ये तीन सामान्य दशाएं हैं। चौथी दशा का नाम है: तुरीय। तुरीय का अर्थ होता है सिर्फ--चौथी दशा। शब्द का अर्थ होता है: चौथा। उसको कोई नाम नहीं दिया है; क्योंकि हमारे पास कोई नाम देने योग्य शब्द नहीं है। तो उसको सिर्फ चौथी दशा कहा है--तुरीय।
तुरीय का अर्थ होता है: बेचैनी जरा भी न रही--न बाहर की, न भीतर की; मगर होश पूरा है। वेदना तो न रही, वेद पूरा है। अब होश के लिए किसी चोट की जरूरत नहीं है। अब बिना चोट के होश है।
यह जो तुरीय की अवस्था है, यह जागरण की, वास्तविक जागरण की अवस्था है। और यह बड़ी अनूठी अवस्था है। यह ऐसी अनूठी अवस्था है कि शरीर सो जाता है, मगर तुरीय की अवस्था में जो व्यक्ति है, वह जागा रहता है। शरीर ही सोता है फिर, अंतस-चेतना कभी नहीं सोती। अंतस-चेतना जागी ही रहती है। वह दीया जलता ही रहता है। वह अखंड जलता है।
ये चार अवस्थाएं हैं। इन्हीं चार के आधार पर रात को भी ज्ञानियों ने चार अवस्थाओं में बांट दिया है।
पहली साधारण अवस्था है: जागरण की--तथाकथित जागरण की। सभी जागे रहते हैं। दूसरी अवस्था है: स्वप्न जैसी--भोग की। भोग यानी स्वप्न। भोग का अर्थ होता है: सपना। कोई धन का सपना देख रहा है कि इतना धन हो जाए, तो मजे में हो जाऊंगा। कोई देख रहा है: ऐसी सुंदर स्त्री मिल जाए, ऐसा सुंदर पुरुष मिल जाए; ऐसा पद मिल जाए, ऐसा कुछ हो जाए--तो सपना है। भोग यानी सपना।
दूसरी अवस्था सपनों से भरे हुए लोगों की। और तीसरी अवस्था पाप की, चोरी की, हत्या की, घृणा की, क्रोध की। वह सुषुप्ति की अवस्था है। सब होश खो गया। उतना भी होश न रहा, जितना सामान्य आदमी को होता है; वह भी गया। तो तीसरी अवस्था चोर की, हत्यारे की, अपराधी की।
और चौथा जो रात का पहर है, वह समानांतर है तुरीय के।अगर चौथे में जाग गए, तो तुरीय में जाग गए। अब यह जो चौथा पहर है, यह एक तरह से और भी समझ लेना।
नींद, वैज्ञानिकों के हिसाब से, रात के अंतिम पहर में सर्वाधिक गहरी होती है। तीन से पांच या चार से छह। प्रत्येक व्यक्ति को थोड़ा-थोड़ा भेद होता है, लेकिन दो घंटे जो अंतिम हैं, वे सर्वाधिक गहरे होते हैं। सुषुप्ति के होते हैं, स्वप्न भी नहीं रह जाता। तो परम शांति होती है। यद्यपि तुम भी नहीं रह जाते, लेकिन फिर भी शांति होती है।
जिस आदमी को रोज दो घंटे सुषुप्ति के मिल जाते हैं, वह तरोताजा होकर उठता है। सुबह उसके जीवन में तुम लहर ताजगी की देखोगे। थकान गई, थका-मांदापन गया। फिर जीवन का उल्हास, फिर उत्साह, फिर उत्सव। रात ने सब चिंताएं छीन लीं। रात ने सब दर्द छीन लिए। रात मलहम-पट्टी कर गई। रात सब घाव भर गई। वह जो दो घंटे तुम खो गए थे बिलकुल, उन खो गए दो घंटों में प्रकृति ने बहुत सा काम कर दिया। जो-जो तुमने खराब कर लिया था पिछले दिन, प्रकृति सब ठीक जमा गई; सब व्यवस्था बिठा गई। तार ढीले पड़ गए थे वीणा के; कस गई। तार ज्यादा कस गए थे, तो ढीले कर गई। लेकिन संतुलन बिठा गई; साज ठीक कर गई। इसलिए सुबह तुम साज की अवस्था में होते हो।
तुम सुबह देखते हो? तुम और ही ढंग के आदमी होते हो, अगर रात ठीक से सो लिए। तुम ज्यादा प्रेमपूर्ण होते हो; ज्यादा दयापूर्ण होते हो; ज्यादा करुणापूर्ण होते हो। तुम्हें वृक्ष ज्यादा हरे दिखाई पड़ते हैं; फूल ज्यादा सुर्ख दिखाई पड़ते हैं, पक्षियों के गीत तुम्हारे कानों में स्पष्ट सुनाई पड़ते हैं। सूरज, सूरज की रोशनी, आकाश की नीलिमा--सब आकर्षित करते हैं। सुबह फिर तुम ऐसे हो जैसे छोटा बच्चा होता है। थोड़ी देर को ही सही, शायद क्षण भर को, दो क्षण को, कुछ पलों को, मगर तुम सुबह बड़े ताजे होते हो।
सुबह तुम से कोई कहे चोरी करो, तो तुम शायद न कर पाओ। सुबह तुमसे कोई कहे कि किसी का कुछ छीन लो, तो शायद तुम न छीन पाओ।
सुबह देना सरल है, छीनना कठिन है। देना आसान है, मांगना कठिन है। सुबह दान सुगम है, छीन-झपट मुश्किल है।
सुबह प्रार्थना सरलता से हो सकती है। यही प्रार्थना सांझ होते-होते मुश्किल हो जाएगी। सुबह तुम आदमी पर भरोसा कर सकते हो, क्योंकि अपने पर भरोसा है। सांझ आते-आते तो आदमी पर अविश्वास हो जाता है, क्योंकि अपने पर अविश्वास हो जाता है। सांझ तक तो तुम हार चुके, दौड़ चुके, गिर चुके, धूल-धूसरित हो चुके। सब चेष्टा कर ली और विषाद हाथ लगा; अब कैसा भरोसा!
सुबह तुममें ताजगी होती है, आत्मविश्वास होता है, भरोसा होता है। वह दो घंटे जो गहरी नींद आ जाती है... वैज्ञानिक हिसाब से...।
और वैज्ञानिक हिसाब भक्तों और योगियों के हिसाब से बिलकुल मेल खा रहा है। वैज्ञानिक हिसाब से दो घंटे आदमी के शरीर का तापमान दो डिग्री नीचे गिर जाता है। सुबह-सुबह, रात के जाते-जाते तुम्हें जो थोड़ी हलकी-हलकी सर्दी, मीठी-मीठी सर्दी लगती है और एक कंबल और खींच लेने का मन होता है, उसका कारण इतना ही नहीं कि सुबह ठंडी होती है। उसका असली कारण यह है कि तुम्हारे शरीर का तापमान दो डिग्री नीचे गिर जाता है। तुम थोड़े ठंडे हो गए होते हो। तुम थोड़े शीतल हो गए होते हो। वह जो मन में चलती हुई उधेड़बुन थी, जो तुम्हें गर्म रखती थी, वह जो भीतर चलता हुआ ज्वर था मन का; वह जो तुम्हें पूरा का पूरा उत्तप्त रखता था, वह चला गया। शोरगुल बंद हुआ; बाजार समाप्त हुआ; सपने भी जा चुके। तुम सब भांति शीतल हो गए। उस शीतलता के कारण, उस मन की शीतलता के कारण तुम्हारी देह भी शीतल हो जाती है। दो डिग्री वस्तुतः तापमान नीचे गिर जाता है। और यही दो घंटे सर्वाधिक गहरी नींद के घंटे हैं। ये दो घंटे अगर तुम सो लिए ठीक से, तो सुबह तुम ताजे अनुभव करोगे। स्वस्थ मन हो जाएगा, स्वस्थ तन हो जाएगा।
ये दो घंटे अगर तुम्हें कोई जगा दे, इन दो घंटों में अगर कोई बाधा डाल दे, तो तुम दिन भर चिड़चिड़े और परेशान रहोगे। छह घंटे सो लिए हो रात, वे छह घंटे काम नहीं आएंगे। ये दो घंटे खराब हो गए तो, बस, अड़चन हो जाएगी। ये दो घंटे भी सो लो रात में और तुम रात भर जागते रहो, तो भी काम चल जाएगा।
ये दो घंटे, वैज्ञानिक कहते हैं, अत्यंत आवश्यक हैं, क्योंकि इन्हीं दो घंटों में तुम्हारी सारी चेतना विलुप्त हो जाती है अंधकार में। अहंकार खो जाता है। बोध सो जाता है। जब तुम नहीं होते, तभी परमात्मा तुम पर काम कर सकता है, प्रकृति तुम पर काम कर सकती है; क्योंकि तुम बाधा नहीं देते।
इसलिए तो जब कोई आदमी बीमार होता है, तो डॉक्टर की पहली फिकर होती है कि उसे नींद आ जाए। क्योंकि नींद में ही प्रकृति उसको स्वस्थ कर पाएगी। अगर नींद न आई, तो वह स्वस्थ हो ही न सकेगा। दवाएं कुछ भी न कर सकेंगी। इसलिए नींद की दवा देते हैं मरीज को। वह सो जाए, तो परमात्मा के कुशल हाथ उसे फिर से ठीक कर जाएं, साज को फिर बिठा दें। इसने तो सब खराब कर लिया है; अब परमात्मा का ही सहयोग मिले, तो ठीक हो सकता है।
नींद में चुपचाप तुम्हारे भीतर प्रकृति काम करती है।
तो वैज्ञानिक कहते हैं: ये दो घंटे नींद के लिए बड़े अनिवार्य हैं।
लेकिन अब तुम थोड़े हैरान होओगे। संतों ने सदा से कहा है: ये दो घंटे याद के लिए हैं। ऊपर से तो दिखाई पड़ेगा कि यह तो विपरीत बात हो गई, क्योंकि अगर दो घंटे याद करना है, तो जागना पड़ेगा। और जागना पड़ा, तो फिर दिन भर चिड़चिड़ापन रहेगा और प्रकृति को मौका न मिलेगा। यह ऊपर की ही बात है। संतों ने कहा, उसके पीछे कारण है।
ये जो दो घंटे सर्वाधिक गहरी नींद के हैं, ये सर्वाधिक गहराई के भी हैं। इन दो घंटों में तुम अपने हृदय से भी नीचे की गहराई में उतर जाते हो।
पहले पहर में सिर में भटकते रहते हो। दूसरे पहर में कंठ में आ जाते हो। तीसरे पहर में हृदय में आ जाते हो। चौथे पहर में हृदय से नीचे उतर जाते हो; अपने अंतस-चेतन में डूब जाते हो।
तो संतों ने कहा कि ये दो घंटे जैसे नींद के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं, सुषुप्ति के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं, वैसे ही जागरण के लिए भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि वहीं से जागरण लाना है। उसी चौथे तल से, उसी तुरीय की अवस्था से जागरण को खींचना है।
लेकिन अगर तुम संतों के ढंग से जागो, तो नुकसान न होगा; चिड़चिड़ापन नहीं आएगा। क्यों? क्योंकि संतत्व का पहला सूत्र ही यह है कि अहंभाव न हो। अगर अहंभाव न हो और तुम जाग जाओ इन दो घंटो में, तो जो लाभ नींद से होना था, वह तो हो ही जाएगा, क्योंकि वह अहंभाव के न होने के कारण होता था। और जो लाभ जागरण से होना है, परम लाभ, वह भी हो जाएगा।
और ये दो घंटे सर्वाधिक महत्वपूर्ण घंटे हैं तुम्हारे चौबीस घंटे में। यह चौबीस घंटे का जो वर्तुल है, इसमें ये दो घंटे सर्वाधिक मूल्यवान हैं। यहां तुम परमात्मा के निकटतम होते हो। अगर तुम सो गए गहरे, तो परमात्मा को मौका मिलता है कि तुम्हें ठीक कर दे। और अगर जाग गए गहरे, तो परमात्मा से मिलन हो जाता है। क्योंकि परमात्मा करीब होता है। सो गए तो भी लाभ होता है, क्योंकि परमात्मा का हाथ तुम्हारे भीतर जा कर काम कर देता है। जाग गए, तब तो कहना ही क्या! हाथ में हाथ पकड़ लेते हो। जाग गए, तो परमात्मा को रंगे-हाथ पकड़ लेते हो। जाग गए तो मिलन हो जाता है, मुलाकात हो जाती है। और एक बार मुलाकात हो जाए, तो यह मुलाकात फिर चौबीस घंटे जारी रहती है। नहीं सांझ नहीं भोर! फिर सुबह-सांझ का कोई फर्क नहीं पड़ता। फिर दिन-रात कहां? फिर तो सब एक सा हो जाता है।
एक दफे उसका हाथ पकड़ में आ जाए, एक दफे पहचान हो जाए, तब तो तुम उसे जगह-जगह पा लोगे, बाजार में भी पा लोगे, पत्नी में भी पा लोगे, बेटे में भी पा लोगे; वृक्ष में, पहाड़-पर्वत में भी पा लोगे। त
ब तो उसके सिवाय कोई है ही नहीं। एक दफे पहचान ही होने की बात है। प्रत्यभिज्ञा हो जाए, एक बार आंख में आंख जुड़ जाए, नजर से नजर मिल जाए, फिर तुम सब जगह पहचान लोगे।
यह जो चौथा पहर है, निश्चित ही बहुमूल्य है। लेकिन संत कहते हैं: जागने का ढंग है उस चौथे पहर में। ऐसे ही जाग जाओगे तो चिड़चिड़े हो जाओगे। प्रभु-स्मरण में जागो, प्रार्थना में जागो, ध्यान में जागो।
उस चौथे पहर को रात का ध्यान बना लो। उस समय ध्यान जितनी सुगमता से हो जाएगा, फिर कभी न हो पाएगा। इसलिए पतंजलि ने कहा है: समाधि सुषुप्ति के बहुत करीब है।
पतंजलि ने तो बड़ी हिम्मत की घोषणा की है कि समाधि और सुषुप्ति एक ही जैसी हैं, जरा सा फर्क है। जरा सा कहो या बहुत बड़ा कहो--एक ही बात है। फर्क इतना है कि सुषुप्ति में होश नहीं होता और समाधि में होश होता है; बाकी सब एक जैसा है।
सुषुप्ति में भी तुम नहीं होते, समाधि में भी तुम नहीं होते। सुषुप्ति में भी सब शीतल हो गया होता है; समाधि में भी सब शीतल हो गया होता है। सुषुप्ति में भी सारा जगत खो गया और समाधि में भी सारा जगत खो गया। सुषुप्ति में विचार न रहे, स्वप्न न रहे; कोई अंतर्वस्तु न रही; सिर्फ चैतन्य मात्र रहा। और वैसा ही समाधि में। लेकिन सुषुप्ति में चेतना सोई हुई होती है; समाधि में जागी हुई होती है। बस, इतना ही फर्क है।
सुषुप्ति से समाधि निकटतम है। सुषुप्ति द्वार है समाधि का--अगर समझ हो।
इसलिए चौथे पहर में जागने की बात संतों ने सदा से कही है। और इसी देश में नहीं कही है। क्योंकि इसका देश से कोई संबंध नहीं है। यह तो मनुष्य की अंतर्प्रकृति के समझने के कारण है।
चाहे चीन, और चाहे इजराइल और चाहे भारत; दुनिया के किसी भी कोने में जब भी लोगों ने परमात्मा की खोज की है, उनको यह बात समझ में आ गई कि चौबीस घंटे में ये दो घंटे जितनी सरलता से प्रवाह होता है परमात्मा में, फिर कभी नहीं होता। इनसे विपरीत घंटे भी हैं। एक वर्तुल है चौबीस घंटे का।
जैसे समझो कि सुबह चार से छह बजे तक अगर तुम्हारा तापमान दो डिग्री नीचे गिर जाता है और तुम सुषुप्ति में खो जाते हो; तो जैसे चार से छह सुबह परमात्मा सर्वाधिक निकट होगा; चार से छह शाम परमात्मा सर्वाधिक दूर होगा। वह दूसरा विपरीत बिंदु है।
तो जिसने ठीक से यह खोज लिया कि कब परमात्मा मेरे निकटतम है, उसे यह भी पता चल जाएगा कि कब मैं परमात्मा से दूरतम होता हूं।
और तब एक सूत्र और तुम्हें याद दिला दूं। अगर तुम्हें यह पक्का पता चल गया कि चार से छह... उदाहरण के लिए कह रहा हूं। किसी का होगा: तीन से पांच; किसी का होगा: दो से चार; किसी का होगा: चार से छह। मगर कहीं चार के आस-पास--इस तरफ या उस तरफ।दो घंटे उस तरफ, तो दो से चार; दो घंटे इस तरफ, तो चार से छह। दो बजे रात और छह बजे सुबह के बीच कभी वे दो घंटे होते हैं।
अगर तुम्हें उन दो घंटों का पता चल गया, तो एक तो यह बात समझ में आ गई कि वे दो घंटे पूरे के पूरे प्रभु-स्मरण में जाने चाहिए। क्योंकि जब सबसे करीब हो, तभी कर लो बातचीत; तभी कर लो गुफ्तगू; तभी कुछ कह लो, कुछ सुन लो। कुछ निवेदन करना हो, तो निवेदन कर दो। इस समय संबंध बहुत स्पष्ट है। आमना-सामना हो रहा है; कही गई बात पहुंच जाएगी। जो संदेश देना चाहते हो, सुन लिया जाएगा। और उस तरफ से अगर कोई उत्तर आया, तो भी पहुंच जाएगा। अन्यथा तुम्हारी प्रार्थना पहले तो पहुंच नहीं सकती, अगर बहुत दूर से पुकारो। अगर पहुंच भी जाए और वहां से उत्तर आए, तो तुम न सुन पाओगे; दूरी बहुत होगी। बीच में हजार बाधाएं होंगी, एक।
और दूसरी बात: ठीक उससे विपरीत; अगर चार से छह सुबह तुम्हारा समय है--चौथा पहर, तो शाम चार से छह तुम्हारा समय है, जब तुम परमात्मा से सर्वाधिक दूर होओगे। तब भी होश रखना। क्योंकि यह चार से छह, यह जो शाम का समय है, यही तुम्हारे पाप का समय होगा। इसको तुम सावधानी से बचाना। इस समय ही तुमसे भूल-चूक होगी। इस समय ही तुमसे गलतियां हो जाएंगी, जिनके लिए जीवन भर पछतावा होगा। क्योंकि इस समय तुम सर्वाधिक दूर रहोगे परमात्मा से। इसी समय तुमसे अपराध हो सकता है; इसी समय तुम से क्रोध हो सकता है, घृणा हो सकती है, ईर्ष्या हो सकती है। इस समय तुम सबसे ज्यादा खिन्न रहोगे। इस समय तुम सबसे ज्यादा उत्तप्त रहोगे। इसी समय तुम्हारा सिर विक्षिप्त रहेगा।
अगर अपना सूत्र साफ हो गया, तो सुबह के दो घंटे परमात्मा की याद में बिता देना; और ये सांझ के दो घंटे भी परमात्मा की याद में बिताना। हालांकि परमात्मा तक आवाज पहुंच नहीं पाएगी। मगर बिताना परमात्मा की याद में ये दो घंटे भी, ताकि कुछ और करने को उपद्रव सुविधा न रहे। कम से कम द्वार-दरवाजे बंद करके शांत बैठने की कोशिश करना।
और तीसरी बात इस संबंध में: जिस दिन इन दो घंटों में जो सबसे दूर है, तुम्हें ऐसा ही अनुभव होने लगे, जैसा सुबह के दो घंटों में होता है, तो समझना कि पहुंच गए। अब कोई फर्क नहीं पड़ेगा--नहीं सांझ नहीं भोर!
जब सर्वाधिक दूर थे, तब भी अगर ऐसा अनुभव में आने लगे कि उतने ही करीब, जितने सुबह, तो क्रांति घट गई। इसी दिन असली भक्त का जन्म होता है। सुनो ये शब्द:
जागै न पिछले पहर, ताके मुखड़े धूल।
जो सुबह के ब्रह्ममुहूर्त में न जागे, जो उस अपूर्व समय का उपयोग न कर ले, अगौरव हाथ लगेगा; अपमान हाथ लगेगा, अप्रतिष्ठा हाथ लगेगी।
...ताके मुखड़े धूल।
मृत्यु ही हाथ लगेगी, अमृत हाथ न लगेगा। तो धूल में धूल एक दिन गिर जाएगी और सारा अवसर खो गया।
इस धूल से फूल भी पैदा हो सकता था, लेकिन तुमने गंवा दिया अवसर। धूल ही थे और धूल ही रहे। इसके पहले कि धूल धूल में गिर जाए, फूल को पैदा कर लो। इस अवसर का उपयोग कर लो।
इसके पहले कि वीणा टूटे, उसमें छिपे संगीत को मुक्त कर लो। इसके पहले कि कंठ नष्ट हो जाए, प्रभु का गीत गुनगुना लो। इसके पहले कि हृदय की धड़कन बंद हो, धड़कन-धड़कन में उसके सुमिरन को गुंजा लो।
वीणा है यह देह और यह वीणा एक ही प्रयोजन से है कि इसमें परमात्मा का गीत उठ सके।इसमें दिव्य गीत उठ सके।
जागै न पिछले पहर, ताके मुखड़े धूल।
सुमरे न करतार कूं, सभी गवावै मूल।।
ब्याज की तो बात ही क्या करो, उसका मूल भी खो जाता है, सभी कुछ खो जाता है। जिसने करतार को याद न किया, जिसने अपने बनाने वाले को याद न किया, जिसने अपने मूल-स्रोत की स्मृति न की...।
पिछले पहरे जागि करि, भजन करै चित लाय।
वह जो पिछला पहर है, जाग जाओ, भजन करो। और भजन यांत्रिक न हो; चित्त लाकर करो।
नहीं तो यांत्रिक भजन करने वाले भी हैं। उनको मैं जानता हूं। उठ कर भी बैठ जाते हैं; झपकी भी खा रहे हैं, राम-राम भी दोहराए चले जाते हैं! राम-राम ऐसे ही दोहराए चले जाते हैं--यंत्रवत! नहीं कुछ अर्थ है उसमें, नहीं प्राणों का कोई संबंध है। बस, ओंठ तक ही बात है। ऐसा मत करना, इससे तो गहरी नींद सो लेना--वही अच्छा। नहीं तो दिन भर चिड़चिड़े रहोगे!
तुमने देखा? सुबह जल्दी उठ आने वाले लोग, धार्मिक कहलाने वाले तथाकथित लोग, दिन भर तुम उन्हें चिड़चिड़ा पाओगे। अगर तुम्हारे घर में एकाध बूढ़े-बुढ़िया को यह झंझट हो जाए सुबह जगने की, ब्रह्ममुहूर्त में याद करने की, तो तुम पाओगे: वह दिन भर बदला लेता है। जैसे तुम्हारा कोई कसूर है। वह चिड़चिड़ा रहेगा, नाराज रहेगा; हर छोटी-छोटी बात में क्रोध से भर जाएगा। बहाने खोजेगा। रोष से भर जाने के लिए तैयारी ही दिखाता रहेगा। हर चीज में भूलें खोज लेगा। वह दिन भर चिड़चिड़ापन बताएगा। घर में एक आदमी धार्मिक हो जाए, तो घर भर की मुसीबत हो जाती है।
मेरे एक पड़ोस में रहने वाली एक महिला ने एक बार मुझे आकर कहा कि मेरे पति आपके पास आते हैं। आप उनको समझा दें। वे आपकी ही मानेंगे, किसी की मान भी नहीं सकते। वे किसी को गिनते ही नहीं। हम तो परेशान हो गए हैं। बच्चे भी परेशान हो गए हैं, अभी बच्चों की परीक्षा पास आ रही है और वे सुबह से उठ आते हैं। सुबह नहीं, आधी रात--दो बजे--और जपजी का पाठ करते हैं!
सरदारजी थे। मजबूत आदमी; वे मोहल्ले भर को जगा देते थे। उनकी पत्नी ने कहा: मोहल्ला भर भी नाराज है। कोई जपजी सुनना नहीं चाहता--दो बजे रात! कोई कुछ कहता भी नहीं, क्योंकि अब किसी के धर्म में क्या बाधा देनी? लेकिन लोग मुझे आकर कहते हैं कि समझाओ अपने पति को। और अब तो बच्चों कि परीक्षा आ रही है, तो बच्चे बहुत परेशान हैं। न वे पढ़ सकते हैं, न सो सकते हैं। और यह आधी रात का उपद्रव... और वह किसी की सुनते नहीं, क्योंकि वे कहते हैं: धर्म में बाधा! तो उनके सामने तो कोई कह नहीं सकता।
वे आए तो मैंने उनसे पूछा। वे आते थे मेरे पास। मैंने पूछा: चरण सिंह! मामला क्या है? आधी रात उठ आते हो? वे बोले: आधी रात नहीं, ब्रह्ममुहुर्त में उठता हूं; दो बजे सुबह उठता हूं। मैंने कहा: दो बजे सुबह? सारी दुनिया उसको आधी रात मानती है। और करते क्या हो? उन्होंने कहा: कुछ नहीं करता; जपजी का पाठ करता हूं। आपसे किसने शिकायत की? मेरी पत्नी आई थी? उसको नहीं सुहाता। धार्मिक नहीं है। संस्कार नहीं हैं। नहीं तो आह्लादित होती कि जपजी का पाठ बिना किए सुनने मिल रहा है।
मैंने उनसे पूछा कि मुझे यह बताओ कि दिन भर तुम्हारी क्या दशा रहती है? क्योंकि वह कसौटी है। तो उन्होंने कहा: चिड़चिड़ापन रहता है; नाराजगी रहती है। हर चीज पर क्रोध रहता है। उसी को मिटाने के लिए तो दो बजे से उठ कर जपजी का पाठ करता हूं। उसी को मिटाने के लिए! मैंने कहा: उसी की वजह से यह हो रहा है। यह तुम छोड़ो।
उनको तो भरोसा न आया। उन्होंने कहा: आप और कहते हैं--छोड़ो? मैंने कहा: इससे न तुम्हें लाभ हो रहा है, न किसी और को लाभ हो रहा है। तुम जिद में पड़े हो। दिन में नींद आती है?
दिन भर नींद आती है।
आएगी ही। अब दो बजे रात से उठ आओगे...। सोते कब हो?
बोले कि ग्यारह साढ़े ग्यारह। बस, इससे ज्यादा देर नहीं।
मगर ग्यारह, साढ़े ग्यारह, बारह बजे सोओगे और दो बजे उठ आओगे, तो फिर दिन भर परेशानी रहेगी। मैंने उनके दफ्तर में भी पूछताछ करवाई। मिलिटरी में थे वे। उनके कैप्टन भी मेरे पास आते थे। उनको मैंने पूछा। उन्होंने कहा: हम भी परेशान हैं। यह आदमी झपकी ही खाता रहता है। यह टेबल पर बैठा है; जरा कोई न देखे कि बस, सो गया! और हर चीज में भूल-चूक करता है। ऐसे है धार्मिक। टेबल पर भी बैठा-बैठा जपजी...।
अंततः वे पागल हुए। मैंने उन्हें बहुत समझाया कि ये पागलपन के लक्षण हैं। मगर उन्होंने कहा: अखंड तो करना ही चाहिए पाठ।
तो वे सब काम करते हुए भीतर जपजी करते रहते। एक दिन हालत बिगड़ गई। रास्ते पर चले आ रहे थे; बस वाले ने हॉर्न बजाया! वे जपजी करते रहे। उनको हॉर्न वगैरह सुनाई न पड़ा। टक्कर खाकर गिर पड़े। फिर पागलपन का दौर शुरू हुआ। फिर कोई दो साल लगे उन्हें खींच लेने में बाहर वापस, उनके पागलपन से। और यह सारा खुद ने आयोजित कर लिया।
सुबह का जो जागरण है, वह जागरण खतरनाक हो सकता है, अगर जबर्दस्ती किया जाए। और अगर उस जागरण में भजन हृदयपूर्वक न हो, और केवल औपचारिक हो, शाब्दिक हो, यांत्रिक हो, लोभ के कारण हो, तो तुम अपनी जिंदगी खराब कर लोगे। वैसे भजन में मत पड़ना।
तो कुछ सूचनाएं तुम्हें दे दूं, नहीं तो सुन कर, कई नासमझ होंगे यहां, वे कल से ही ब्रह्ममुहूर्त, दो बजे शुरू कर दें।
पहली बात: अगर सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठना हो, तो कम से कम नौ बजे सोने चले जाना। और जिसे नौ बजे सोने जाना हो, उसे दफ्तर दफ्तर में छोड़ आना चाहिए। नौ बजे आने के पहले तक उसे सारे संसार से अपने को बाहर हटा लेना चाहिए--‘रूठे-से’... रूठ जाना चाहिए संसार से। उदासीन हो जाना चाहिए।
दफ्तर से चलते वक्त बहुत होशपूर्वक दफ्तर को नमस्कार कर लेना चाहिए। दुकान छोड़ते वक्त कह देना चाहिए: अब कल आएंगे; कल तक विदा। फिर भूल कर भी उसका विचार नहीं करना। पुरानी आदत होगी; कुछ दिन आएंगे। लेकिन धीरे-धीरे होश सम्हालना और उसको विदा कर देना। घर आ गए; दफ्तर भूल जाना चाहिए। दुकान-बाजार भूल जाना चाहिए।
अगर नौ बजे सोने जाना हो, तो सात बजे से तैयारी करने लगना--सोने की। क्योंकि नींद एकदम से नहीं आ सकती। और पहले पहर में सबसे ज्यादा कठिन है।
स्नान कर लेना; शांत बैठना; अब कोई जरूरत नहीं कि अखबार पढ़ो। क्योंकि अखबार इस जगत के पागलपन की सूचना देता है। इस जगत के पागलपन की खबरें हैं उसमें: कहीं हत्या हो गई; कहीं चोरी हो गई; कहीं कोई मार डाला गया; कहीं बम गिरा--कहीं युद्ध हो गया; कहीं कुछ, कहीं कुछ। सब उपद्रव की खबरें हैं।
सांझ का वक्त--उपद्रव की खबरें अगर पढ़ोगे, तो रात दुख-स्वप्न देखोगे। पढ़ोगे तो यही कि इंदिरा गांधी कब जेल जाने वाली है। लेकिन रात जेल चले जाओगे। क्योंकि वही गूंजता रहता है खोपड़ी में। उसकी तरंगें बनी रहती हैं।
रेडियो मत सुनना; अखबार मत पढ़ना; टेलीविजन मत देखना। सच तो यह है कि अगर नौ बजे रात सोने चले जाना हो, तो तेज रोशनी में भी मत बैठना। पढ़ना भी मत। शिथिल करना अपने को, लेट जाना--बाथटब में; घड़ी भर वहां पड़े रहना ज्यादा अच्छा होगा; गरम जल में डूबे रहना; शिथिल हो जाना।
हलका भोजन करना। ज्यादा भोजन मत कर लेना। क्योंकि जितना ज्यादा भोजन कर लोगे, उतना चौथे पहर में जागना मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि उतनी ही ज्यादा देर शरीर को पचाने में लग जाएगी। अगर हलका भोजन किया, तो तुम अचानक पाओगे कि तीन बजने के करीब आते-आते नींद अपने से जाने लगी। क्योंकि शरीर को जरूरत नहीं रही। जितना भारी भोजन कर लोगे, जितना ठूंस-ठूंस कर पेट में भर दोगे, उतना ही शरीर को पचाने में लंबा समय लग जाता है। और जब तक शरीर का भोजन न पच जाए, तब तक जागरण नहीं आता।
खयाल रखना नींद और भोजन का गहरा संबंध है। इसीलिए तो जब कभी तुम उपवास करते हो, तो रात में नींद नहीं आती। क्योंकि बिना भोजन के नींद की जरूरत कम हो जाती है। नींद की सबसे बड़ी जरूरत है--भोजन को पचाना। इसलिए तो जब तुम भोजन कर लेते हो, तत्क्षण झपकी आने लगती है। इधर भोजन किया और झपकी आने लगती है। क्यों? क्योंकि जो जीवन-ऊर्जा है, जो तुम्हारे मस्तिष्क को ज्वलंत रखती है, ज्योतिर्मय रखती है, वह जीवन-ऊर्जा तत्क्षण पेट की तरफ बहने लगती है। क्योंकि पेट में पचाने की जरूरत आ पड़ी। और पचाना पहली जरूरत है। होश इत्यादि तो नंबर दो की जरूरतें हैं।
शरीर में भोजन आ गया, तो सारी शरीर की ऊर्जा भोजन को पचाने में लग जाती है। इसलिए नींद मालूम होने लगती है।
जब जागना हो ब्रह्ममुहूर्त में, तो हलका भोजन करना; कि तीन बजे, चार बजे तक आते-आते भोजन का काम पूरा हो जाए। शरीर को तुम अपने से जागता पाओगे। तुम चार बजे के करीब पाओगे: आंख खुल गई।
अलार्म भर कर मत उठना। क्योंकि वह जबर्दस्ती है; उसकी कोई जरूरत नहीं।
अलार्म की जगह एक नई कला सीखना। रात जब सोने लगो, प्रभु का स्मरण करते सोना, और प्रभु को कह कर सोना कि ‘उठा देना मुझे चार बजे।’ तुम कुछ ही दिन में पाओगे: तीन-चार सप्ताह के भीतर यह कला काम करने लगेगी। तुम अचानक पाओगे: जैसे कोई जगा गया।
और प्रभु के द्वारा जगाए जाने का मजा ही और है। जैसे कोई कह गया: उठो गोपाल। कोई निश्चित कह जाएगा। अगर तुमने चार बजे कहा, तो चार बजे ही यह घटना हो जाएगी।
लेकिन रात जब सोने लगो, तो प्रार्थना करते ही सोना। स्मरण करते हुए सोना। क्योंकि रात तुम जो भी स्मरण करते सोते हो, उसकी धुन रात भर बजती रहती है। रुपये गिनते सोए, तो रात भर रुपये गिनोगे।
मुल्ला नसरुद्दीन कपड़े की दुकान करता है। एक रात बीच रात में उठ कर चादर फाड़ डाली। जब चादर फाड़ रहा था, तभी पत्नी ने कहा: अरे, अरे! यह क्या करते हो? तो मुल्ला बोला: चुप रह। तू दुकान पर भी आने लगी? तब उसे होश आया। वह किसी ग्राहक को सपने में कपड़ा दे रहा था। चादर फाड़ रहा था।
तुम जो सोचते सोओगे स्वभावतः उसकी धुन तुम्हारे भीतर बजती रहेगी।
जो अंतिम विचार होता है सोते समय, वही प्रथम विचार होगा--जागते समय। यह गणित है। यह शत प्रतिशत सही गणित है। इसमें जरा भी भेद नहीं पड़ता।
तो रात भूल कर भी ऐसा विचार कर के मत सोना, जिसे तुम सुबह साक्षात नहीं करना चाहते हो।
रात चिंता लेते सोओगे, सुबह वही चिंता करते उठोगे। इसकी तुम परख कर लेना। क्योंकि जो मैं कह रहा हूं, वह वैज्ञानिक है। इसकी तुम परख कर लेना। दो-चार दिन परख कर के देखो। रात सोते-सोते-सोते देखते रहना कि आखिरी बात कौन सी रही मन में। और तब तुम चौंक जाओगे। सुबह जब जागोगे, तुम अचानक पाओगे: वही बात दरवाजे पर खड़ी है। जो रात अंतिम रही, वही सुबह प्रथम होगी। उसी से मुलाकात होगी। उसी को सोचते-सोचते सो गए थे; वह अधूरी पड़ी रह गई थी। फिर जब जागोगे, तो उसी से फिर गुजरोगे। फिर उसी से मिलन हो जाएगा। इसलिए भक्तों ने कहा है: सोने जब जाओ रात, तो प्रभु-स्मरण करते सोना। ताकि वही सुबह स्मरण में रहे।
और प्रभु को कह कर सोना! उससे अच्छा जगाने वाला और कोई भी नहीं। उसको कहना कि तू ही जगा देना। चार बजे उठा देना।
अभी कल मुझे लंदन से एक पत्र मिला--एक संन्यासी की मां का। संन्यासी कुछ तीन महीने यहां था। अभी कोई महीने भर पहले गया। उसको कैंसर था। कोई तीन महीने पहले चिकित्सक उसे सर्जरी के लिए टेबल पर लिटा दिए थे। संयोग की बात... कभी-कभी संयोग भी बड़े महत्वपूर्ण होते हैं।
और उन्होंने यह सोच कर कि शायद वह बचे या न बचे... क्योंकि खतरनाक ऑपरेशन था। पूरा पैर उसका काटना पड़ता था। फिर भी बचेगा, इसका पक्का नहीं था। क्योंकि पैर में तो कैंसर फैल ही गया था; ऊपर भी फैलने की संभावना थी। फैल भी गया हो; कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन पैर तो अलग करना ही पड़ेगा, शायद बच जाए, शायद न बचे। तो जिस विश्वविद्यालय में वह युवक... कैंब्रिज में वह युवक विद्यार्थी था; तो कैंब्रिज के ईसाई पुरोहित को बुला लिया कि वह आकर कम से कम ऑपरेशन के पहले उसे कुछ उपदेश दे दे।
यह संयोग की बात थी कि कैंब्रिज का जो पुरोहित था, वह मुझमें उत्सुक था। वे भी आकर अब संन्यस्त हो गए हैं।
तो उस पुरोहित ने जा कर ‘मस्टर्ड सीड’ नाम की मेरी किताब उस युवक को दी और कहा कि तू इसको पढ़ जा; जितना थोड़ा बहुत पढ़ सके।और मेरा तो सुझाव यह है कि बजाय तू ऑपरेशन करवाने के, पहले पूना हो आ। अब यह ऑपरेशन तो होगा। तू बचेगा कि नहीं बचेगा, यह तो दूर बात है। लेकिन थोड़ा ध्यान सीख आ।
उस युवक को बात जम गई। वह टेबल से उठ आया। उसने कहा: पहले मैं यह किताब पढूं, फिर मैं निर्णय करूं। किताब पढ़ कर तो वह तीसरे दिन पूना आ गया।
उसकी हालत निश्चित ही खराब थी। चिकित्सकों ने कहा भी था कि यह जाना खतरनाक है, क्योंकि कैंसर फैल सकता है। मैंने भी उससे कहा कि तू आ गया है--ऐसी खतरनाक हालत में, तो तीन दिन यहां रह ले और वापस चला जा। वह तीन दिन रहा। फिर उसने कहा: अब तो जाने का मन नहीं। मौत ही आएगी, तो आने दें। मरने के पहले थोड़ा शांत हो लूं, थोड़ा प्रसन्न हो लूं। मौत तो आनी ही है। और चूंकि मौत इतने करीब है; मेरे पास समय भी गंवाने को नहीं है। आप सब के पास तो समय भी गंवाने को है, उसके पास समय भी गंवाने को नहीं था।
वह तत्क्षण संन्यस्त हुआ। तीन महीने यहां रहा; धीरे-धीरे उसका आनंद बढ़ता गया। कैंसर भी बढ़ता गया और आनंद भी बढ़ता गया! गांठें उसकी, जब वह यहां से गया, तो उसकी गर्दन पर भी आ गईं। मगर जरा भी चिंता न थी; जरा भी पीड़ा न थी; बड़ा आह्लादित था। उसका चेहरा देखते बनता था। उस पर दया भी आती थी कि वह दिन दो दिन का मेहमान है।
ऐसे तो सभी दिन दो दिन के मेहमान हैं। दया तो सभी पर आती है। पर उसका तो बहुत साफ ही मामला था। और उसकी निश्चिंतता देख कर बड़ा आनंद भी आता था। उसका आनंद देख कर बड़ा आनंद भी आता था।
उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई थी; उसके चेहरे पर एक रस आ गया था। उसकी आंखों में चमक आ गई थी। तो जब मैंने उससे कहा कि अब तू जा भी। अब तीन महीने तू रह लिया; ध्यान भी तूने सीखा; अब जा। यह ऑपरेशन निपटा ले।
तो उसने कहा: अब मैं जा सकता हूं। अब मुझे चिंता नहीं। मौत हो कि जीवन, कुछ फर्क नहीं पड़ता। मैं मस्त हूं। मैं प्रभु को याद करते मर सकता हूं।
कल उसकी मां का पत्र आया कि वह चल बसा। लेकिन चलने के पहले वह ‘मस्टर्ड सीड’ अपनी मां को भेंट कर गया। और चलने के पहले एक अपूर्व घटना हुई। उसी घटना के लिए मैंने यह उल्लेख किया। कोई दो घंटे पहले... तीन बजे होंगे दोपहर के, वह बहोश हो गया। खुश था, आनंदित था। उसकी मां ने लिखा है कि वह मर गया, इसका हमें दुख नहीं है। हमें खुशी इस बात की है कि यह जो पांच-सात दिन वह पूना से लौट कर हमारे पास रहा, इतना आनंदित था...! हमने इतना आनंदित उसे कभी नहीं देखा था। क्योंकि बचपन से ही तड़प रहा था। वह पैर की खराबी बचपन से थी। और इतना प्रेमपूर्ण भी कभी नहीं देखा। और मौत इतनी करीब थी। और इतना जीवंत भी उसे कभी नहीं देखा। तो हम खुश हैं, हम प्रसन्न हैं। वह विदा तो हुआ है, लेकिन उसके विदा होने के बाद घर में एक ऐसी शांति छोड़ गया है, जैसी हमने कभी नहीं जानी।
दो घंटे पहले बेहोश हो गया और बेहोशी में उसने दो बार बुदबुदा कर कहा: पांच बजने को पांच; पांच बजने को पांच!
पिता और मां दोनों मौजूद थे, डॉक्टर मौजूद थे। कुछ समझे नहीं। पांच बजने को पांच, पांच बजने को पांच... लेकिन बात तो साफ ही थी कि वह घड़ी की बात कर रहा है। तीन बजे थे! पांच बजने को पांच ज्यादा दूर भी नहीं थे। तो वे प्रतीक्षा करते रहे। घबड़ाए कि शायद कुछ होने वाला है पांच बजने को पांच बजे... फिर कुछ भी नहीं हुआ, तो निश्चिंत हो गए। लेकिन दूसरे दिन सुबह पांच बजने को ठीक पांच मिनट थे, तब उसकी मृत्यु हुई। तब पिता मौजूद थे। जैसे ही वह मरा, उन्होंने घड़ी देखी; पांच बजने को पांच!
अगर तुम शांत हो जाओ, तो सुबह कब जागना है, यह तो कोई बात ही नहीं; परमात्मा में कब जाना है, इसका भी बोध हो जाएगा। तुम्हें अपनी मृत्यु की घड़ी भी साफ-साफ प्रकट हो जाएगी। जागने की तो क्या बात है? मौत की घड़ी भी साफ हो जाएगी।
रात सोते समय जल्दी सो जाओ। कम भोजन कर के सोओ; हलका भोजन करके सोओ। ऐसा जो किसी तरह का बोझ न लाए, जिसका पता ही न चले कि तुम्हारे शरीर पर बोझ है। किया न किया बराबर जैसा लगे।
घड़ी आधा घड़ी गरम जल में पड़े रहो। दिन भर की सारी चिंताओं से छुटकारा पा लो। उन सबको विदा कर दो। रात भर के लिए द्वार-दरवाजे संसार के बंद कर दो। फिर प्रभु को स्मरण करते सो जाओ। उसी को कह दो कि सुबह उठा देना--जब तेरा मुहूर्त आ जाए। और तुम थोड़े ही दिन में पाओगे कि ठीक मुहूर्त पर उठने लगे।
और जब तुम बिना किसी बाहरी दबाव के... अलार्म के या किसी के द्वारा उठाए जाने के उठोगे, तो तुम पाओगे: दिन भर बड़ी शांति, कोई चिड़चिड़ाहट नहीं। फिर हृदयपूर्वक स्मरण करना।
उठ कर स्नान कर लेना, बैठ जाना फव्वारे के नीचे। और स्मरण को ऐसा करो कि वह सब तरफ से आने लगे। वह जो जलधार गिरती हो तुम्हारे ऊपर, वह भी उसी की जलधार है। उसी का जल है; उसी की हवा है; उसी का आकाश है। उसको ही अनुभव करना।
सब तरह से स्वच्छ होकर बैठ जाना, शांत, एक कोने में, धीमा सा दीया जला देना। अगरबत्ती या धूप या जो भी तुम्हें प्रीतिकर लगे, उस सुगंध से कमरे को भर लेना। यह जगह जहां तुम प्रार्थना करो, अगर रोज वही हो, एक ही जगह हो, तो अच्छा। और एक ही ढंग से करो, तो अच्छा।
वही स्नान रोज, वही भाव रोज; धीरे-धीरे सघन होता जाता है। धीर-धीरे ऐसी घड़ी आ जाती है कि ब्रह्ममुहूर्त आते ही तुम्हारे प्राण-प्राण में उसका नाद उठने लगेगा।
ऐसा होता है न। रोज तुम ग्यारह बजे भोजन करते हो, तो ग्यारह बजे भूख लगती है। रोज दस बजे रात सोने जाते हो, तो दस बजे झपकी आने लगती है, जम्हाई आने लगती है। ऐसा ही ठीक प्रार्थना भी होती है।
रोज नियम से करोगे, रोज वहीं करोगे, रोज वैसे ही करोगे, रोज-रोज, रोज-रोज, धीरे-धीरे सघन होते-होते तुम्हारे प्राण-मन सब में उतर जाएगी। तब तुम एक दिन अचानक पाओगे: यह भी एक भूख है, बड़ी गहरी भूख है। और परमात्मा भोजन है।
जब भूख उठ आती है, तो भोजन भी मिलता है। जब प्यास उठ आती है, तो उसकी जलधार भी बरसती है।
लेकिन सुबह के ये दो घंटे अपूर्व हैं; अगर सहज भाव से उठ सको--तो ही। असहज नहीं, चेष्टा से नहीं--सरलता से। चाहे महीने दो महीने लग जाएं सरलता से उठने में, लेकिन उठना सरलता से ही। और ऐसा आयोजन करना।
उन दो घंटों के हिसाब से बाकी बाईस घंटे का आयोजन करना कि वे दो घंटे सरलता से उठ सको--इस तरह से बाईस घंटे जीना। वे दो घंटे तुम्हारे शिखर हो जाएं। उन्हीं पर सब समर्पित हो जाए। उठो, तो उनके लिए उठना। खाओ, तो उनके लिए खाना। सोओ, तो उनके लिए सोना। बोलो, तो उनके लिए बोलना। कुछ भी करो, तो खयाल रखना कि उन दो घंटों पर क्या असर पड़ेगा।
इस आदमी को गाली देंगे, तो कहीं ऐसा तो न होगा कि मन में क्रोध अटका रह जाएगा और मेरे वे दो घंटे खराब हो जाएंगे? इतना लोभ करूंगा, तो फिर सांझ को बिना लोभ के सो सकूंगा? इतनी धन की चिंता करूंगा, इतनी आकांक्षा, अभीप्सा करूंगा धन की, तो क्या फिर सुबह का ब्रह्ममुहूर्त मुझे उपलब्ध होगा? इस ढंग से सोचना।
वे दो घंटे तुम्हारा मंदिर हैं। उनको ही बनाना है। और सारा जीवन उन्हीं दो घंटों के मंदिर को बनाने में ईंट बन जाए। इस तरह चलोगे, तो तुम एक दिन पाओगे चरणदास क्या कह रहे हैं।
पिछले पहरे जागि करि, भजन करै चित लाय।
चरनदास वा जीव की, निस्चै गति ह्वै जाय।।
वह निश्चित परमगति को उपलब्ध हो जाता है; मोक्ष को उपलब्ध हो जाता है।
इस जगत में उनकी ही गति होती है, जो प्रभु के स्मरण से भर जाते हैं। क्योंकि उसके स्मरण के सहारे ही गति है। उसके स्मरण की नौका मिल जाए, तो ही उस पार जाना हो सकता है, नहीं तो इस पार ही पड़े रहोगे। यही सड़न, यही गलन, यही नरक!
चरनदास वा जीव की, निस्चै गति ह्वै जाय।।
पहिले पहरे सब जगैं, दूजे भोगी मान।
तीजे पहरे चोर ही, चौथे जोगी जान।।
जो कोई विरही नाम के, तिनकूं कैसी नींद।
और फिर तो एक ऐसी घड़ी आ जाती है:
जो कोई विरही नाम के, तिनकूं कैसी नींद।
कि फिर तो कभी नींद लगती ही नहीं। शरीर जरूर सोता है; शरीर की जरूरत है। थकता है तो सोता है। लेकिन चेतना थकती ही नहीं; उसके सोने की कोई जरूरत ही नहीं।
शरीर को सोने की जरूरत है, क्योंकि शरीर क्षणभंगुर है, यंत्रवत है। यंत्र थक जाते हैं। तुम्हारी कार भी तुम चलाते रहो आठ-दस घंटे, तो रोक देनी पड़ती है। यंत्र थक जाता है।
चेतना यंत्र नहीं है; चेतना शाश्वतता है। कैसी थकन? अनंतकाल से चल रही; अनंतकाल तक चलती रहेगी। कहीं कोई थकन नहीं।
चेतना कोई यंत्र थोड़े ही है, जो थक जाए। यंत्र होता है, तो घर्षण होता है--यंत्र के अलग-अलग अंगों में, उसी के कारण थकन होती है। चेतना के कोई अंग भी नहीं है। चेतना अखंड है।
शरीर को भूख लगती है, क्योंकि ऊर्जा चाहिए। थकान होती है, क्योंकि ऊर्जा चली गई। विश्राम की जरूरत होती है, ताकि फिर वह ऊर्जा उपलब्ध हो जाए।
लेकिन चेतना तो शाश्वत है, अमृत है। न तो थकान होती है, न भूख लगती है, न विश्राम की जरूरत होती है। मगर उस चेतना का तुम्हें अभी पता ही नहीं। अभी तो तुम जिसको चेतना कहते हो, वह चेतना की बहुत दूर की धुन है: बहुत दूर की प्रतिध्वनि, प्रतिफलन।
जैसे चांद बनता हो झील में और झील में बने चांद को तुम असली चांद समझ लो। ऐसे ही तुम्हारी बुद्धि में जो चेतना का बिंब पड़ रहा है, वह कोई असली चेतना नहीं है। इसलिए कहा: तुम्हारा जागरण औपचारिक है; असली जागरण बुद्धों का है।
जो कोई विरही नाम के, तिनकूं कैसी नींद।
सस्तर लागा नेह का, गया हिये कूं बींध।।
शस्त्र जिनके हृदय में बिंध गया प्रेम का, प्रभु-प्रेम का, अब कहां नींद? अब कैसी नींद?
सोये हैं संसार सूं, जागे हरि की ओर।
समझना।
तुम संसार में जागे हो, परमात्मा में सोए हो। भक्त परमात्मा में जागता है, संसार में सो जाता है।
सोये हैं संसार सूं,...
संसार की तरफ सो गया जो।
...जागे हरि की ओर।
ये दो शब्द याद रखो: काम और राम। जो काम की ओर उन्मुख है, वह राम की ओर विमुख। जिसने काम की ओर मुंह किया, राम की ओर पीठ हो जाती है। और जिसने राम की ओर मुंह किया, उसकी काम की ओर पीठ हो जाती है।
सोये हैं संसार सूं, जागे हरि की ओर।
तिनकूं इकरस ही सदा, नहीं सांझ नहीं भोर।।
फिर न कोई सुबह है, न कोई सांझ है। चौबीस घंटे, अहर्निश वही है। फिर कोई भेद नहीं। जागो तो वह, सोओ तो वह। उठो तो वह, बैठो तो वह। जीओ तो वह, मरो तो वह। हर हालत में वही--और वही; एक ही स्वर। एक ही स्वाद। ‘तिनकूं इकरस ही सदा, नहीं सांझ नहीं भोर।’
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।
भक्त तो फिर भगवान से भी कह देता है: अब औरों की तो क्या कहूं? भक्त कहता है: तुम भी रूठ जाओ, तो मुझे परवाह नहीं। जानता है कि अब तुमसे अलग होने का उपाय ही नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।
दीप स्वयं बन गया शलभ अब जलते-जलते,
मंजिल ही बन गया मुसाफिर चलते-चलते,
गाते-गाते गेय हो गया गायक ही खुद,
सत्य स्वप्न ही हुआ स्वयं को छलते-छलते,
डूबे जहां कहीं भी तरी, वहीं अब तट है।
अब चाहे हर लहर बने मझधार, मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।
यह बड़े प्रेम का वचन है।
अब पंछी को नहीं बसेरे की है आशा,
और बागबां को न बहारों की अभिलाषा,
अब हर दूरी पास, दूर है हर समीपता,
एक मुझे लगती अब सुख-दुख की परिभाषा,
अब न ओंठ पर हंसी, न आंखों में है आंसू,
अब तुम फेंको मुझ पर रोज अंगार, मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।
अब मेरी आवाज मुझे टेरा करती है,
अब मेरी दुनिया मेरे पीछे फिरती है,
देखा करती है मेरी तस्वीर मुझे अब
मेरी ही चिर प्यास अमृत मुझ पर झरती है,
अब मैं खुद को पूज, पूज तुमको लेता हूं,
बंद रखो अब तुम मंदिर के द्वार, मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।।
सुनते हो?
दीप, स्वयं बन गया शलभ अब जलते-जलते,
पतंगा जब दीये पर गिर जाता है, फिर कैसी दूरी?
दीप, स्वयं बन गया शलभ अब जलते-जलते,
अब तो पतंगा दीया बन गया; दीया पतंगा बन गया।
एक घड़ी आती है भक्त की, जब भगवान में गिर जाता है, जैसे पतंगा दीये पर गिर जाता है। फिर भक्त ही भगवान हो जाता है।
दीप, स्वयं बन गया शलभ अब जलते-जलते,
मंजिल ही बन गया मुसाफिर चलते-चलते,
गाते-गाते गेय हो गया गायक ही खुद,
सत्य स्वप्न ही हुआ स्वयं को छलते-छलते,
डूबे जहां कहीं भी तरी वहीं अब तट है,
अब चाहे हर लहर बने मझदार, मुझे परवाह नहीं है।
भेद गए, अभेद आया। द्वैत गया, अद्वैत आया। अब प्रेमी अपने प्रिय पात्र से भिन्न नहीं है।
अब मेरी आवाज मुझे टेरा करती है,
वह जो आवाज एक दिन लगती थी, परमात्मा की आवाज है, कि कहती थी: उठो गोपाल; कि सुबह हुई। अब वह आवाज परमात्मा की आवाज नहीं, मेरी ही आवाज है। अपने ही अंतर्तम की आवाज है--अपनी ही अंतरात्मा की।
अब मेरी आवाज मुझे टेरा करती है,
अब मेरी दुनिया मेरे पीछे फिरती है,
देखा करती है मेरी तस्वीर मुझे अब
भक्त इतना एक हो जाता है भगवान से कि अब अपनी तस्वीर और भगवान की तस्वीर अलग-अलग मालूम नहीं होती।
मेरी ही चिर प्यास अमृत मुझ पर झरती है,
अब मैं खुद को पूज, पूज तुमको लेता हूं,
बंद रखो अब तुम मंदिर के द्वार, मुझे परवाह नहीं है।
यह बड़े प्रेम का वचन है।
अब मैं खुद को पूज, पूज तुमको लेता हूं,
अब भेद ही न रहा। नहीं सांझ नहीं भोर!
सोवन जागन भेद की कोइक जानत बात।
कोई विरला ही जानता है सोने और जागने का भेद।
साधूजन जागत तहां, जहां सबन की रात।
साधु वहीं जागता है, जहां सबकी रात है--वह चौथा पहर। जो सबकी गहरी सुषुप्ति है, वही साधु की जाग्रति है, ध्यान है, समाधि है।
साधूजन जागत तहां, जहां सबन की रात।।
जो जागै हरि-भक्ति में, सोई उतरै पार।
जो जागै संसार में, भव-सागर में ख्वार।।
और जो संसार में जागा है, वह नष्ट होगा।
जागै न पिछले पहर, ताके मुखड़े धूल।
सुमरै न करतार कूं, सभी गवावै मूल।।
सतगुरु से मांगूं यही, मोहि गरीबी देहु।
गरीबी का अर्थ होता है: मुझसे ऐसा सब छीन लो, जिसकी याद परमात्मा में बाधा बनती हो। मुझसे वह सब अलग कर लो, जो मेरे और परमात्मा के बीच दीवाल बनता हो।
सतगुरु से मांगूं यही, मोहि गरीबी देहु।
दूर बड़प्पन कीजिये, नान्हा ही कर लेहु।।
अब मुझे इतना छोटा बना दो, मेरा सारा बड़प्पन ले लो। मगर एक बात भर पूरी हो जाए। कितना ही छोटा बनाओ, ऐसी कुछ दशा मेरी कर दो कि परमात्मा की कृपा मुझ पर बरस सके।
छोटा बनाने का वही अर्थ होता है।
जब बच्चा छोटा होता है, तो मां उसकी जरा सी आवाज सुन कर भागी आती है। जैसे-जैसे बड़ा होने लगता है, वैसे-वैसे मां उसकी चिंता छोड़ने लगती है। जब वह जवान हो जाएगा, तो मां को उसकी चिंता की कोई जरूरत न रहेगी।
तुम जितना अपने को बड़ा मानोगे, उतना ही--परमात्मा की तुम्हें जरूरत नहीं--इसकी तुम घोषणा कर रहे हो।
भक्त कहता है: मुझे छोटा कर दो। मुझे इतना छोटा कर दो कि मैं केवल रोने में समर्थ रह जाऊं। मेरा रोना ही प्रार्थना बन जाएगी।
सतगुरु से मांगूं यही, मोहि गरीबी देहु।
दूर बड़प्पन कीजिये, नान्हा ही कर लेहु।।
मुझे मिटा दो। मैं बचूं न, ताकि परमात्मा ही बचे। मुझे पोंछ दो, मुझे हटा दो।
प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलिए
जिस जगह मैं थकूं, उस जगह तुम चलो।
कब्र-सी मौन धरती पड़ी पांव पर,
शीश पर है कफन-सा घिरा आसमां,
मौत की राह में, मौत की छाह में
चल रहा रात-दिन सांस का कारवां,
जा रहा हूं चला, जा रहा हूं बढ़ा,
पर नहीं ज्ञात है किस जगह शाम हो?
किस जगह पग रुके, किस जगह मग छुटे
किस जगह शीत हो, किस जगह घाम हो,
मुस्कुराए सदा पर धरा इसलिए,
जिस जगह पर मैं झरूं, उस जगह तुम खिलो।
प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलिए
जिस जगह मैं रुकूं, उस जगह तुम चलो।
प्रेम का पथ सूना अगर हो गया,
रह सकेगी बसी कौन सी फिर गली?
यदि खिला प्रेम का ही नहीं फूल तो,
कौन है जो हंसे फिर चमन में कली?
प्रेम को ही जग में मिला न मान तो
यह धरा, यह भुवन सिर्फ श्मशान है,
आदमी एक चलती हुई लाश है,
और जीना यहां एक अपमान है,
आदमी प्यार सीखे कभी इसलिए
रात-दिन मैं ढलूं, रात-दिन तुम ढलो।
प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलिए
जिस जगह मैं थकूं, उस जगह तुम चलो।
आदमी दीन हो जाए, वहीं परमात्मा की शक्ति मिलनी शुरू हो जाती है। जहां आदमी गिरता है, वहीं परमात्मा के चरण तुम्हें चलाने लगते हैं। जहां तुम झरते हो, वहीं परमात्मा खिलता है।
मैं दरिद्र हो जाऊं, दीन हो जाऊं, छोटा हो जाऊं--भक्त की इस अभिलाषा में सिर्फ एक ही घोषणा है: मेरा अहंकार न बचे। मुझे मिटाओ। अनुकंपा करो। मुझे जलाओ, मुझे राख कर दो।
आदि पुरुष किरपा करौ, सब औगुन छुटि जाहिं।
साध होन लच्छन मिलैं, चरनकमल की छाहिं।।
आदि पुरुष किरपा करौ,...
भक्त कहता है: मेरे किए जो हो सकता है, वह मैं कर रहा हूं। लेकिन मेरे किए अंतिम बात नहीं हो सकती। वह तो तेरी कृपा से होती है। अंतिम बात मेरे हाथ में नहीं है।
मैं पुकारूंगा; मैं रोऊंगा; मैं प्रार्थना करूंगा; मैं स्मरण करूंगा; मैं सब करूंगा--जो मैं कर सकता हूं। लेकिन मेरा सामर्थ्य कितना? मेरे हाथ कितने बड़े? तेरे आकाश तक नहीं पहुंच सकेंगे। हाथ फैला कर भी खड़ा हो जाऊंगा तो मेरे हाथ छोटे हैं। मैं तुझे न छू पाऊंगा। तेरी कृपा के बिना न हो सकेगा।
इसलिए कृपा के तत्व को ठीक से समझ लेना। भक्ति के मार्ग पर कृपा अनिवार्य तत्व है; अंतिम तत्व है।
भक्त सब करता है, लेकिन अंततः यही जानता है: होगा उसकी कृपा से। इसलिए भक्त के मन में अहंकार नहीं उठता।
प्रयास पर भरोसा ही नहीं तो अहंकार कैसे उठेगा? भक्त जो करता है, जानता है: उससे पाने में कुछ सहायता नहीं मिलेगी; सिर्फ मैं पाना चाहता हूं--इसकी खबर परमात्मा तक पहुंचेगी। मेरी चाह सच्ची है; मेरा ईमान सच्चा है; मैं ऐसे ही नहीं मांग रहा हूं। मांगने के लिए सब-कुछ करने को तैयार हूं। लेकिन फिर भी मेरे किए क्या होगा? उसकी कृपा चाहिए।
आदि पुरुष किरपा करौ, सब औगुन छुटि जाहिं।
मैं तो छुड़ाऊंगा भी अवगुण, तो एक छुड़ाऊंगा, तो दूसरा फंस जाता है। एक से बचता हूं, तो दूसरे में उलझ जाता हूं।
यहां कांटे ही कांटे हैं। अगर अहंकार से छुटकारा पाओ, तो विनम्रता की अकड़ आ जाती है। अगर संसार छोड़ दो, तो त्याग की अकड़ आ जाती है। अगर धन छोड़ दो, तो इतने धन पर मैंने लात मार दी--यह अकड़ पैदा हो जाती है। यहां तो बड़े उपद्रव हैं। यहां एक चीज हटाओ, दूसरी पकड़ जाती है। यहां से बचना दिखाई नहीं पड़ता।
आदि पुरुष किरपा करौ, सब औगुन छुटि जाहिं।
साध होन लच्छन मिलैं,...
मैं कोशिश तो करता हूं, साधु होने की, चरणदास कहते हैं, लेकिन हो नहीं पाता। कुछ भी करता हूं, उसी में से असाधुता निकल आती है। साधु बन कर बैठ जाता हूं, तत्क्षण पता चलता है कि अहंकार वहां भी आ गया। तेरी कृपा हो, तो ही साधु होने के लक्षण मिलेंगे, अन्यथा नहीं।
साध होन लच्छन मिलैं, चरनकमल की छाहिं।
तेरे चरणों की छाया मिले, तो सब मिल गया। उसी छाया में मेरे हृदय के फूल खिलेंगे; मेरे खिलाए नहीं खिलेंगे। तेरी अनुकंपा में, तेरी वर्षा में, तेरे प्रसाद में...।
हिय हुलसो आनंद भयो,...
और तेरे चरणकमल की छांह जब भी मिल जाती है, क्षण भर को भी मिल जाती है: ‘हिय हुलसो आनंद भयो।’ तभी मेरा हृदय नाचने लगता है। और तभी आनंद हो जाता है।
...रोम-रोम भयो चैन।
और बिना कुछ किए रोआं-रोआं शांत हो जाता है। सब तरफ विश्राम, विराम आ जाता है। सब दौड़ चली जाती है।
हिय हुलसो आनंद भयो, रोम-रोम भयो चैन।
भये पवित्तर कान ये, मुनि सुनि तुम्हरे बैन।।
परमात्मा मौन है, इसलिए उसका नाम: मुनि। वह बोलता नहीं, फिर भी बोलता है।
उपनिषद कहते हैं: उसके पैर नहीं, फिर भी चलता है; तब तो आता है भक्त तक; नहीं तो कैसे आएगा? पैर तो उसके नहीं हैं। और हाथ नहीं हैं उसके, या हजार हाथ हैं उसके।क्योंकि सभी को सहारा दे देता है। और बोलता नहीं, लेकिन उसके मौन में उपदेश है।
भये पवित्तर कान ये,...
चरणदास कहते हैं कि ये कान मेरे पवित्र हो गए। तुम बोले नहीं, और मेरे कान पवित्र हो गए।
...मुनि सुनि तुम्हरे बैन।
तुम्हारे मौन से जो संदेश मिल गया; तुम्हारे चरणों की छाया में बैठ कर जो संदेश मिल गया; तुम्हारी अनुकंपा में जो आशीर्वाद मिल गया--मेरा हृदय हुलसा, आनंद हुआ।
तुम्हारे मौन में कहे गए शब्द, अनकहे शब्द, मेरी सारी अपवित्रता को लेकर बह गए। तुम्हारे मौन की लहर क्या आई, मैं नहा गया। ब्रह्म-सिंध की लहर है...।
बांस के वन में से गुजरती हुई हवा
जैसा बोलती है
बांस के वन में से गुजरती हुई हवा
जैसा बोलती है
या बिलकुल सबेरे-सबेरे बादल के दलों में किरण
जैसा रंग घोलती है
या जैसे आधी रात के सूने में गहरी होती है सुगंध
या जैसे अलस काले नाग में बंध के रह जाता है छंद
ऐसा परमात्मा चारों तरफ मौन से बोल रहा है।
बांस के वन में से गुजरती हुई हवा
जैसा बोलती है
तुम्हें सुनना आ जाए, तो तुम इन पक्षियों के नाद में उसी को सुनोगे।
बांस के वन में से गुजरती हुई हवा
जैसा बोलती है
फिर तो बांस के वन में से गुजरती हुई हवा भी, उसी के ओंठ पर रखी बंसी है। बंसी भी बांस से ज्यादा क्या है? कोई बंसी का नाद सुनने के लिए आदमी के ओंठ पर ही होना जरूरी तो नहीं?
बांस के वन में गुजरती हुई हवा
जैसा बोलती है
या बिलकुल सबेरे-सबेरे बादल के दलों में किरण
जैसा रंग घोलती है
यह उसी का हाथ है। यह वही चितेरा है, जो सुबह बादलों को रंग जाता है, जो सांझ तारों को सजा जाता है। सब तरफ उसकी कला है। सब तरफ उसके हस्ताक्षर हैं--पत्ते-पत्ते पर, पत्थर-पत्थर पर।
या बिलकुल सबेरे-सबेरे बादल के दलों में किरण
जैसा रंग घोलती है
आंख हो देखने की, कान हो सुनने को, फिर वही है--और केवल वही है।
या जैसे आधी रात के सूने में गहरी होती है सुगंध
फिर हर गंध उसकी सुगंध है। फिर सब तरफ से उसी का संकेत आता है।
या जैसे अलस काले नाग में बंध के रह जाता है छंद
तुमने देखा, कभी मदारी अपनी बीन बजाता है। इधर मदारी की बीन बजती है, उधर छंद काले नाग में बंध कर रह जाता है।
वैज्ञानिक अपूर्व बात कहते हैं। वे कहते हैं: नाग को कान नहीं होते। इसलिए बड़ी मुश्किल थी। अब यह प्रत्यक्ष अनुभव है कि मदारी बीन बजाता है और नाग नाचता है; छंदबद्ध हो जाता है।
वैज्ञानिक बड़ी चिंता में रहे वर्षों तक कि मामला क्या है? क्योंकि नाग को कान होते ही नहीं, नाग बज्र बहरा है। कान होते ही नहीं। बज्र बहरा कहना भी ठीक नहीं; बहरे को कम से कम कान तो होते हैं।
दिखाई तो पड़ते हैं; काम न करते हों। लेकिन नाग को कान होते ही नहीं। कान की इंद्रिय ही नाग में नहीं है। इसलिए वैज्ञानिक बड़े चिंतित थे। और इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता। तो वे कई सिद्धांत खोजते थे कि हो सकता है, वह जो मदारी बीन बजा कर डोलने लगता है, उसको देख कर... लेकिन मदारी दूसरे कमरे में बैठ कर बीन बजाए; नाग को दिखाई भी न पड़े, तो भी नाग डोलता है।
नाग को पकड़ने की तरकीब ही यह है कि नाग अगर छिपा हो दूर खोह में और मदारी बीन बजाए, तो अपनी गुफा से निकल आता है। तो गुफा में दिखाई तो पड़ता नहीं, इसलिए बात हल नहीं होती थी।
फिर धीरे-धीरे और विश्लेषण से पता चला कि नाग को कान तो नहीं होते, लेकिन नाग का पूरा शरीर ध्वनि के प्रति संवेदनशील है। पूरा शरीर... जैसे हमें कोई छूए, तो हमें स्पर्श का अनुभव होता है, ऐसे ध्वनि की जो तरंग पड़ती है, नाग का पूरा शरीर उसे स्पर्श करता है। पूरा शरीर उसे अनुभव करता है। तो यह कहना ठीक नहीं कि नाग को कान नहीं होते। यह कहना चाहिए कि नाग पूरा का पूरा कान है। इसलिए कान पकड़ में नहीं आते। पूरी देह ही उसकी कान है।
या जैसे अलस काले नाग में बंध के रह जाता है छंद
ऐसे ही जिस दिन तुम्हें प्रभु की मौन-वाणी सुनाई पड़ेगी, तुम नाग की तरह छंदबद्ध हो जाओगे।
ये चरणदास के वचन वैसी ही छंदबद्धता से निकले हैं। चरणदास कोई कवि नहीं हैं। यह कविता कविता नहीं है; यह कविता अनुभव है, स्वानुभव है। यह कुछ तुकबंदी नहीं है कि व्याकरण, भाषा और मात्रा और छंद के नियम से इनका निर्माण हुआ हो। नहीं; जो भीतर जाना है, और तुमसे कह देना चाहा है। और जो भीतर जाना है, वह इतना छंदबद्ध है कि उसके प्रभाव में जो कहा है, वह भी छंदबद्ध हो गया।
बुद्धों के सभी वचन काव्य होते हैं। वे कविता में हों, या न हों, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके भीतर जिस महाकाव्य का जन्म हुआ है, उसमें डूब कर आते सभी शब्द संगीतमय हो जाते हैं।
चरणदास के आज के इन वचनों पर खूब ध्यान करना। ऐसे ही जैसे:
बांस के वन में से गुजरती हुई हवा
जैसा बोलती है
या बिलकुल सबेरे-सबेरे बादल के दलों में किरण
जैसा रंग घोलती है
या जैसे आधी रात के सूने में
गहरी होती है सुगंध
या जैसे अलस काले नाग में बंध के रह जाता है छंद
आज इतना ही।